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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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14 August 2009

तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ

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श्री प्रियरँजन जी राँची से हैं, और पेशे से पत्रकार हैं । वह उदयकेशरी जी के ब्लाग सीधी बात ( Dare to say truth ) पर यदा कदा पोस्ट भी देते रहते हैं । जून 2008 में उनकी एक पोस्ट रिंगटोन का बाज़ार और संस्कृति एक साथ कई प्रश्न उठाती है । किंवा किसी पाठक को उनकी बात को आगे बढ़ाने का साहस न हुआ होगा । पर स्थियाँ जस की तस तो क्या हैं, बल्कि बद से बदतर ही होती जा रही हैं, जरा देखिये तो

बरसों पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘अजनबीपन’ - दिल्ली में अकेले रहते हुए रात को टेलीफोन बूथ से अपने घर फोन करने के अनुभव पर । मुझे याद है कि एसटीडी तारों के उलझे हुए दिनों में बड़ी मुश्किल से फोन मिला करते थे, लेकिन जब मिल जाया करते तो अचानक उनकी मशीनी ध्वनि बेहद मानवीय हो जाती । लगता था, जैसे बीप बीप की वह आवाज़ मुझे दिल्ली और रांची के बीच बिछे अनगिनत उलझे तारों के रास्ते 1200 मील दूर अपने घर के ड्राइंग रूम तक ले जाती है ।

आज जब रिंगटोन और कॉलर ट्यून्स की एक रंगारंग दुनिया हमारे सामने है, तब भी मुझे रात ग्यारह बजे के आसपास बजती हुई वह बीप बीप याद आती है, क्योंकि इस ध्वनि से मेरी पहचान थी, वह मेरा धागा थी, जो मुझे दूसरों के साथ बांधती थी । आज वह ध्वनि मुझे नहीं मिलती, क्योंकि जब भी मैं किसी को फोन करता हूं, दूसरी तरफ कोई धुन, किसी फिल्मी गीत की कोई पंक्ति, या कोई बंदिश प्यार, इसरार, मनुहार या शृंगार बिखेरती हुई मेरी प्रतीक्षा की घड़ियों को मादक बना रही होती है ।

दरअसल इन दिनों मोबाइल क्रांति ने ‘रिंगटोन’ और कॉलर ट्यून्स’ के जरिये जो नई सांगीतिक क्रांति की है, उसके कई पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है । आप किसी को फोन करें और आपको कोई अच्छी सी धुन या बंदिश सुनाई पड़े, इसमें कोई बुराई नहीं लगती । यही नहीं, जो लोग फोन पर अपनी पसंदीदा धुनें लगाकर रखते हैं, उनका एक तर्क यह भी हो सकता है कि इससे उनके व्यक्तित्व का भी कुछ पता चलता है ।

लेकिन क्या संगीत का यह उपयोगितावाद क्या एक सीमा के बाद खुद संगीत के साथ अन्याय नहीं करने लगता... संगीत का काम सारी कला-विधाओं की तरह एक ऐसे आनंद की सृष्टि करना है, जिसके सहारे हमें अपने-आप को, अपनी दुनिया को कुछ ज्यादा समझने, कुछ ज्यादा खोजने में मदद मिलती है । लेकिन जब हम संगीत को ‘टाइम पास’ की तरह इस्तेमाल करते हैं तो उसको उसके मूल लक्ष्य से भटकाते हैं । किसी फोन कॉल पर किसी बड़े उस्ताद की पांच सेकंड से लेकर 15 या 30 सेकंड तक चलने वाली बंदिश जब तक आपकी पकड़ में आती है, ठीक उसी वक्त कोई आवाज इस बंदिश का गला घोंट देती है ।

आप शिकायत नहीं कर सकते, क्योंकि आपने संगीत सुनने के लिए नहीं, बात करने के लिए किसी को फोन किया है । संगीत तो बस उस इंतज़ार के लिए बज रहा है, जो आपका फोन उठाए जाने तक आपको करना है । आप इस समय जम्हाई लें या बंदिश सुनें, किसी को फर्क नहीं पड़ता । अलबत्ता बंदिश को ज़रूर फर्क पडता है, क्योंकि पांच बार उसे पांच-दस या 20-30 सेकंड तक आप सुन चुके हैं और उसका जादू जा चुका है । छठी बार वह पूरी बंदिश सुनने भी आप बैठें तो उसका अनूठापन आपके लिए एक व्यतीत अनुभव है, क्योंकि आपको मालूम है कि इसे तो आपने अपने किसी दोस्त के मोबाइल पर सुन रखा है ।

असल में हर फोन सिर्फ गपशप के लिए नहीं किया जाता, बल्कि सिर्फ गपशप जैसी कोई चीज नहीं होती - कोई न कोई सरोकार उस गपशप की प्रेरणा बनता है, कोई न कोई संवाद इसके बीच आता है, सुख या दुख के कुछ अंतराल होते हैं । जाहिर है, संगीत की कोई धुन या बंदिश इस संवाद में बाधा बनती है । आप किसी अफसोस या दुख की कोई खबर साझा करने बैठे हैं और आपको फोन पर कोई भैरवी या ठुमरी या चालू फिल्मी गाना सुनने को मिल रहा है तो आपको पता चले या नहीं, कहीं न कहीं, यह आपके दुख का उपहास भी है । यही बात सुखद खबरों के साथ कही जा सकती है ।

संस्कृति एक बहुत बड़ी चीज है, उसे आप काटकर प्लेटों में परोस नहीं सकते, उसे टुकड़ा-टुकड़ा कर पैक नहीं कर सकते । लेकिन बाजा़र यही करने की कोशिश कर रहा है । वह मोत्सार्ट, बाख, रविशंकर, हरिप्रसाद चौरसिया और उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जादू छीनकर उसे अपनी डिबिया में बंद कर रहा है और बेच रहा है । खरीदने वालों को भी संस्कृति का यह इत्र रास आ रहा है, क्योंकि इसके जरिये वह बता पा रहे हैं कि उनका नाता बड़ी और कलात्मक अभिव्यक्तियों से भी है ।

दरअसल हर ध्वनि का अपना मतलब होता है, हर मुद्रा का अपना अर्थ । दरवाजे पर दस्तक देने की जगह कोई गाना गाने लगे तो इसे उसका कला प्रेम नहीं, उसकी सनक मानेंगे । ध्वनियों के सहारे हम हंसी को भी समझते हैं, रुलाई को भी । अगर हवा के बहने और पानी के गिरने की ध्वनियां किन्हीं दूसरे तरीकों से हम तक पहुंचने लगें तो समझिए कि कुदरत में कोई अनहोनी हुई है - या तो कोई भयावह तूफ़ान हमारे रास्ते में है या कोई विराट बाढ़ हमें लीलने को आ रही है । क्या मोबाइल क्रांति ने हमारी ध्वनि-संवेदना नहीं छीन ली है, वरना हम एक आ रहे तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ क्यों होते...?

सीधी बात : रिंगटोन का बाज़ार और सँस्कृति / जून 1, 2008 से साभार

5 सुधीजन टिपियाइन हैं:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi टिपियाइन कि

हमारी ध्वनि संवेदना को वाकई छीन ली गई है।

cmpershad टिपियाइन कि

बढिया लख प्रस्तुत करने के लिए आभार।

बी एस पाबला टिपियाइन कि

बढ़िया!
इसे पढ़ा था पहले भी।
आपके सौजन्य से पुन: ध्वनि संवेदना खोने का भय हो आया

Arvind Mishra टिपियाइन कि

हाँ संस्कृति और प्रद्योगिकी का यह द्वंद्व राग विराग और रसभंग कर रहा है

Udan Tashtari टिपियाइन कि

हर ध्वनि का अपना मतलब होता है, हर मुद्रा का अपना अर्थ -पूर्णतः सहमत!

बढ़िया आलेख.

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