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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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28 August 2009

जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

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यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक होगा । क्या पता, अपने विनाश का ताना बाना बुन रही हमारी सभ्यता इन चित्रों को साबूत रहने भी देगी ? तब इन्हें देख  एक सिहरन होगी.. क्या हम ऎसे थे ?
( अधिकाँश चित्र लँदन म्यूजियम के वेबसाइट और  जिन अन्य सूत्रों से सँकलित हैं, उन सबका आभार )

vaishnav                                                 वैष्णवजन तो तेने कहिये

Viceroy House n Parliament                    वायसराय हाउस ( अब राष्ट्रपति भवन ) और पार्लियामेन्ट बना ही था

GT ROAD                        तब शेरशाह सूरी मार्ग ( अब का जी०टी० रोड ) पक्का न हुआ था

Nauch Girls Sonagachhi          लेकिन तब की राजधानी कलकत्ता में सोनागाछी की नाच कन्यायें आबाद हो चुकी थीं

Jama Maszid Delhi 1908 अपनी दिल्ली भी तो तब ज़ामा मस्ज़िद के आसपास ही सिमटी हुई थी, नई दिल्ली बसना शुरु हुई थी

A Princess posing over her Hiunt                   राजे रजवाड़े निरीह जन्तुओं के आखेट के अपने शौर्य को ही सहेजे फिरते थे

a gathering of women in a party Bombay 1910   अँग्रेज़ बहादुर की कृपा से बने नवधनाढ्यों  और अभिजात वर्ग का एकमात्र श्रम आमोद प्रमोद ही था

Desi Slaves Serving a Firangi Master                यह और बात थी कि, तब हम ग़ुलाम थे , जैसे दासता ही हमारी नियति थी

Imperial Airways 'Hanno' Planes carried official Mails , Its refuelling at Shrjah 1913 तक तो हमारे शासन और शोषण की बागडोर सुदूर लन्दन से हवाई डाक द्वारा चलाई जाने लगी

 

► इससे आगे ►
इन रचनाओं के यहाँ होने का मतलब
अँतर्जाल एवं मुद्रण से समकालीन साहित्य के
चुने हुये अँशों का अव्यवसायिक सँकलन

(संकलक एवं योगदानकर्ता के निताँत व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर सँग्रह !
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