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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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6 June 2010

अमेरिका का राष्ट्रपति… और उसके मज़े

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पिछले दिनों, करीब दो-ढाई माह पहले एक फ़ीचर पढ़ा था, “ अफ़गानिस्तान में फँसा अभिमन्यु – अमेरिका “ !  हालाँकि इसमें सामयिक वस्तुस्थितियाँ पूरी ईमानदारी से बयान की गयीं थी, पर मुझे इस फ़ीचर के शीर्षक में अभिमन्यु का होना नागवार गुज़रा था । हठात मुझे बरसों पहले एक कविता याद आयी, “ अमेरिका के राश्ट्रपति के मज़े “ उसके शब्द भले ही मानस से विस्मृत हो गये थे, पर अपने भाव के साथ उस कविता का पूरा प्रभाव  मुझ पर अरसे तक बना रहा । वह सब अनायास ही ताज़ा हो आया, पुनः पढ़ने की चाह हुई !

और… जैसा कि होता है, इस कविता को पुनः पढ़ने की चाह एक बेचैनी में बदल गयी । साहित्यानुराग जब व्यसन बन जाये, तो किताबों से अटी आलमारियाँ पुराने सँदर्भों को तलाशने में आपके छक्के छुड़ा देती हैं । टुकड़ों टुकड़ों में कई दिनों के बाद कुछ सफ़हों पर बरामद हुये ’ मज़े करते हुये अमेरिका के राष्ट्रपति ’ ! तेजी से बदलते हुये घटनाक्रम में भी अब तक यह रचना अपनी प्रासँगिकता को पूरी  तरह से  बखूबी जी रही है ।

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अमेरिका का राष्ट्रपति होने के बड़े मजे हैं 
 इसे इस तरह भी कहा जा सकता है
यदि किसी देश का राष्ट्रपति होने के मजे हैं
तो वह बस अमेरिका का राष्ट्रपति होने में हैं
या इस तरह भी यदि कहीं किसी राष्ट्रपति के
मजे है तो वह बस अमेरिका के हैं

अमेरिका के राष्ट्रपति की क्या यह कोई कम मजेदारी है
कि वह जब चाहे किसी छोटे बड़े देश को
अपने सामने कान पकड़कर उठक बैठक लगवा सकता है
यारी यारी में किसी भी मित्र देश के साथ वह
गर्दन में बांह डालकर चलते हुए
जरा सी बात पर उसकी गर्दन दबा सकता है
अपने पैरों पर दौड़ने की कोशिश में जुटे किसी भी देश की
गति में चुपके से मारकर टंगड़ी उसे मुंह के भर धड़ाम से
जमीन पर गिरने के लिये कर सकता है विवश

उसके क्या मजे हैं कि वह किसी भी देश का
शासन संभालने के लिए अपनी छाया भेज सकता है
और उस तरह अमेरिका का राष्ट्रपति
उस देश का भी राष्ट्रपति हो सकता है

वह कभी भी संयुक्त राष्ट संघ पहुंच कर पीछे से
महासचिव के सिर पर धप्पा मारकर छुप सकता है
जरूरतमंदों के लिए मदद भरकर आगे बढ़ चुके
टकों के पहियों की बीच रास्ते में हवा निकाल सकता है
कभी भी अंतराष्टीय मुद्रा कोष का स्ट्राँग रूम खुलवा कर
उसमें रखे पैसे गिन सकता है विश्व बैंक के दरवाजे पर
ताला लटका कर उसकी चाबी अपनी जेब में रख सकता है
और तो और इतने सबके बाद वह अंगूठे से अपनी नाक
उठा कर अपना हाथ नचाते हुए स्टेचू
फ लिबर्टी के पास
खड़ा हो कर वह सबको अपनी जीभ चिढ़ा सकता है

अमेरिका के राष्ट्रपति होने के जो मजे है उनमें से
एक मजा ये भी है कि किसी उम्र में उसका चेहरा
प्लेब्वाय के मुख पृष्ठ पर छपने लायक बना रहता है
उसके पुरूषार्थ के धब्बे उसके दफतर की युवा
महिला कर्मचारियों के अधोवस्त्रों पर सगर्व पाये जाते हैं
वह खुद नियमों कानूनों को नहीं मानता तो
उसके बच्चे भी कुछ नहीं सीख पाते उससे और इस वजह से
अक्सर सुधारगृहों में सजा भुगतते सुधरते पाये जाते है
यह भी कितना मजेदार है कि अमेरिका के राष्ट्रपति का घर
सुधारगृह के स्तर का भी नहीं है

उसके इतने मजे हैं कि उसे इस बात से
कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उससे कितनी नफरत करता है
उसके चाहने भर से किसी को भी उससे
उसके प्रति अपनी नफरत के बराबर प्रेम या
अपने प्रेम के बराबर नफरत करनी पड़ सकती है
न चाहते हुए भी अपने बच्चों को
अ से अमेरिका ब से ब्रिटेन यह वर्णमाला पढ़ाने
के लिये होना पड़ सकता है लाचार

मजे-मजे वह जब चाहे पेन्टागन की बनी अपनी
एक ऐसी कार जिसके दरवाजों से, दोस्ता और दुश्मन
दोनों की तरह बाहर निकलने की सुविधा है,
वह अपने मूँछ पर ताव देता बाहर निकल सकता है
वह अपने ही पैदा किये दुश्मन को मारने अपनी गेंद ढूंढते
जिद्दी बच्चे की तरह किसी भी देश को खंगाल सकता है
वह वारिसों को ही अपनी विरासत लूटने के लिये उकसा सकता है
वह वियतनाम को अपने सिर की तरह खुजा सकता है  
कंबोदिया को नोच सकता है ब्रिटेन की तरह

वह अपने इतिहास को पूरी दुनिया में  
मुख्य इतिहास की तरह संभालने
और शेष दुनिया को अपना अपना इतिहास
उपइतिहास की तरह मानने की दे सकता है हिदायत
अपने ही देशवासियों के साथ साथ चढ़ाते हुए
अपने हथियारों की बाहें अन्य देशों से भी
कह सकता है जो मेरी लड़ाई में साथ नहीं मेरे
वह इतिहास में भी साथ नहीं होंगे मेरे
और मेरे बिना इतिहास भी दुनिया का क्या इतिहास
अमेरिका के राष्ट्रपति होने के जितने मजे हैं वह
दुनिया के किसी देश के राष्ट्रपति होने के नहीं

आप हो जायें किसी भी देश के राष्ट्रपति
आपके राष्ट्रपति होने का तब क्या मतलब
जब आपकी जेबें डालरों से न भरी हों
इस मामले में एक अमेरिका का राष्ट्रपति ही है
जिसकी जेब उलीचने की हद तक डालरों से भरी रहती है

अपने कोट की जेबों में भरे डालरों के मजेदार खेल में 
वह इतना माहिर होता है कि उसके दायीं जेब से
डालर निकालकर बायीं तरफ उछालते ही
इराक हो जाता है और बायीं जब से निकालकर
दायीं तरफ उछालते ही हो जाता है अफगान
वह यूरों को पुचकारता है उसे ज्यादा न उछलने की
सलाह देता है और डालर के कान में
धीरज बनाये रखने के लिए फुसफुसाता है

अमेरिका का राष्ट्रपति बस अमेरिका का राष्ट्रपति
होने की वजह से इतने मजे में दिखाई देता है
कि उसकी रगड़ने की वजह से अक्सर
लाल हो जाती आंखों में लगातार किरकिरी सा चुभता
क्यूबा किसी को दिखाई ही नहीं देता
अपने प्रेम के बराबर नफरत करनी पड़ सकती है न चाहते हुये
क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति होने के अपने ही मज़े हैं

मूल स्रोत : पहल’ 86..   त्रैमासिकी अँक - मई, जून, जुलाई 2007..
खँड - पहल-कवितायें-विशेष .. .. रचना- श्री पवन करण पृष्ठ 52-54

प्रpledge of labor party-usaसँगतः  अँतर्जाल से एक अन्य छवि

 

 

 

 

 

 

 

 

 

मुझे लगता है कि इस कविता की प्रासँगिकता पर आज भी कोई प्रश्नचिन्ह नहीं उठ सकता, सो इसे यहाँ सहेज़ दिया । जबकि यह बता दूँ कि यह कविता श्री पवन करण द्वारा सन 2005 के पूर्वार्ध में लिखी गयी थी और पहल ’86 के  अँक में  प्रथम  बार  दृष्टिगोचर  हुई  है । स्थितियाँ जस की तस हैं, बल्कि वह बदतर की ओर ही घिसटती जा रही हैं । अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति का मूल चरित्र अपनी जगह बरकरार है, राष्ट्रपति का नाम और नस्ल बदल जाने मात्र से क्या होता है ? 

इससे आगे

26 April 2010

अज़ीब आदमी

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उन दिनों सरकार  ने  बाहर  जाने  पर  कड़ी  पाबंदी  लगा  रखी  थी   और  क्योंकि  बुलावा  केवल  धर्म  और  रणधीर  का था, इसलिए मंगला और दिल्लू नहीं जा सकती थी। बड़ी दौड़-भाग की, लेकिन  वक्त  न हीं था । धर्म  ने कहा कि वह  भी नहीं जाएगा, तो रणधीर ने कहा, वह अकेला चना क्या भाड़ फोड़ने जाएगा ।

_______________________________
नहीं भई, अपनी पहली फिल्म जा रही है । आप लोगों का जाना बहुत जरूरी है । केशव ने राय दी।
नहीं, मंगला नहीं जा सकती, इसलिए मै नहीं जाउंगा ।
अरे तो क्या हुआ तुम चले जाओ । विलायत भागा थोड़े ही जाता है, फिर चले जाएंगे । मंगला ने आग्रह किया। उसके फरिश्तों को भी मालूम न था कि जरीना और आमिना इंग्लैण्ड गई हुई है । वहां से वह भी जर्मनी जाएंगी। मीना को उसके पतिदेव ने नहीं जाने दिया, क्योंकि उनका भी बुलाया नहीं था, बेचारी रो-पीट कर चुप हो गई ।

बात बिगड़ने पर तुली हुइ्र थी । किसी फुर्तीले फोटाग्राफर ने दूसरे ही दिन अखबार के लिए वहां खींचे हुए फोटो भेज दिए और जब वे फोटो छपे तो मंगला पर जैसे बिजली गिर पड़ी । बच्चे पार्क में खेलने गए हुए थे । वह फटी-फटी आंखों से फोटो देखती रही । हर फोटो में धर्म और जरीना साथ थे । चालाक फोटोग्राफर ने आमिना और रणधीर को इस सफाई से काटा था कि सिर्फ़ उनके ही वहाँ होने का सन्देह भी न होता था, और उनके सम्बन्ध में सांकेतिक रूप से कुछ छींटे भी कसे गए थे । पुराने तनाव का भी जिक्र था, मंगला की अनुपस्थिति का हवाला भी दिया था । ऐसा मालूम होता था, धर्म जानबूझकर उसे नहीं ले गया, ताकि वहां दोनों गुलछर्रें उड़ा सकें । कई बार जी चाहा, गिलास में सारी की सारी नींद लाने वाली गोलियां उडेलकर इस जानलेवा दुख को खत्म कर डाले कि पीछा छूटे ।
लेकिन फिर सोचा, वह तो वे दोनों चाहते ही है । नहीं इस जन्म में तो उन्हें खुख नहीं करना है । लेकिन जब ले जाने का इरादा नहीं था, तो उसने कहा क्यों था । शायद इसलिए कि मैं नागपुर न जा सकूं, मेरा प्रोग्राम भंड करके खुद चला जाए क्योंकि उसमें मुहम्मद रफी है । मुहम्मद रफी से बैर है ।  इसलिए कि वह मुझे काम देता है तो श्रीमानजी की बेइज्जती होती है ।

सुबह रफी की पार्टी नागपुर जा रही है । उसने फौरन फोन किया । लेकिन वहां गाउंगी क्या ? कुछ तैयारी भी नहीं की है । रहने दो ।
अरे नहीं, नहीं यह नहीं हेा सकता । तुम्हें चलना पड़ेगा । कुछ भी गा देना ।
रफी और मंगला रात डेढ़ बजे तक हारमोनियम पर रिहर्सल करते रहे ।

धर्म को प्लेन ही में मालूम हेा गया था कि वहां वह भी आ रही है । वह बड़ी उदारता और लापरवाही से हंस दिया ।
कैसी हो ? धर्म ने जरीना को देखकर औपचारिकता से पूछा ।
अच्छी हूं, आप तो बहुत बिजी है न, पिक्चर शुरू हो गई है न ? इंग्लैण्ड में बड़ा मजा आया । मैनें तो कहा, आओ आमिना आपा यहां खो जाए.........। बड़बड़ बड़बड़ घँटों वह बकती रही । धर्म के माथे पर नमी आई ।
धर्म ने उसके कंधे को छुआ और जब मुड़ी तो उसके सामने हथेली फैला दी ।
सदियां भागती-दौड़ती गुजर गई, युग बीत गए ।
वह मुटिठयां भींचे उसके हथेली को घूर रही थी ।
वह देखा, आमिना ने घसीटकर उसे अपने आगे कर लिया । और फव्वारे के पास छूटती हुई आतिशबाजी देखती रही ।
धर्म ने मुटठी बंद करके जेब में डाल ली । उसकी नर्म-नर्म आखों में आतिशबाजी का अक्स धड़धड़ जल रहा था । वह रात रणधीर ने मोर्चें पर बिताई । उसे धर्म के पागलपन में कोई शक नहीं रहा था । उसने कभी एक इंसान को बिना खून की एक बूंद बहाए यों फड़फड़ाते नहीं देखा था ।
___________________________________
नागपुर का प्रोग्राम काफी सफल रहता अगर ऐन वक्त पर मंगला जरूरत से ज्यादा पीकर स्टेज पर न आ जाती । किसी को आशंका न थी कि वह इस हद तक आदी हो चुकी है । सुबह से वह होटल में अपने कमरे में बन्द पड़ी थी । जब वह झूमती-लड़खड़ाती स्टेज पर आई तो सब अचम्भे में रह गए । उलझे बाल, बेतरतीब कपड़े । इधर आर्केस्टा ने साज मिलाए उधर उसे बड़े जोर की उबकाई ने धर दबोचा । मारे सडांध के नाकें सड़ गई । बड़ी मुश्किल से उसे बाहर ले गए ।
अखबार में पूरे विवरण के बाद लिखा था कि धर्म जर्मनी गया हुआ है और शायद मंगला का पैर भारी है ।
क्या जरूरत थी जाने की ? मैने मना किया था । वह एकदम नर्म पड़ गया, मुझे बताया भी नहीं मंगलू ने ।
तुम्हें फुर्सत मिले तो बताए । यार, गर्दन उड़ा देने के काबिल हो । तुम जैसी उसकी बेकद्री करते हो, वही है जो बर्दाश्त कर ही है । कोई और होती तो कभी की तुम्हारे जनम में थूक कर अलग हो गई होती ।
अबकी फिर बिटिया दो, और हम भी ऐसी सुपर हिट फिल्म बनाएंगे कि दुनिया देखती रह जाएगी । उसने मंगला के बेड पर बैठकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा ।
बिटिया । हुंह, भगवान न करें । उसने धर्म का हाथ झटक दिया और ऐसे दूर हट गई जैसे वह कोढ़ी हो ।
मंगलू......................
बाबा, यह चोंचले वहीं बघारो जाकर । वह बेड से उठकर डेसिंग टेबुल पर जा बैठी । दराज खोलकर उसने गिलास में थोड़ी सी व्हिस्की डाली और कंघी करने के लिए चोटी खोलने लगी ।
मंगलू, यह सबेरे सबेरे..।
तो ? मंगला ने जैसे उसे चिढ़ाने के लिए नीट पीनी शुरू कर दी ।
यह अच्छा नहीं मंगला ।
क्या अच्छा है और क्या अच्छा नहीं, यह मैं भी जानती हूं । तुम क्यों फिक्र में घुलू जाते हो ।
मंगला ।
अरे बाबा, जाओ न अपनी गुलबदन के पास । बड़ी मुश्किल से तो रूठी देवी को मनाया है, कहीं फिर न रूठ जाए ।
धर्म उसकी आखों का जहर न बर्दाश्त कर सका, तेजी से बाहर निकल गया । मंगला ने दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया और कुंडी चढ़ा ली ।

___________________________________________
अभी मंगला और धर्म के अलग हेा जाने के बारे में हर एक को मालूम न हुआ था ।
बाहर दरवाज़े पर फ़रीद खड़ा था और फरीद ने तो अभी इंडस्ट्री में पांव भी न रखा था । फिल्मी पति घरों में कम ही मिलते है । मंगला ने धर्म के घर में न होने की कोई चर्चा न की ।
बोलने जा रही थी, अरे उनके कहने का क्या ठीक ! लेकिन फिर वह संभल गई, बोली कि भूल गए होंगे ।
मैं यह पूछने आया था कि शूटिंग है कि नहीं । उन्होंने कहा था, शूटिंग शुरू होगी तब सेट पर ही टेस्ट लेंगे । टेलीफोन पर कोई ठीक से जवाब नहीं देता ।
फिल्म लाइन पसन्द है ।
हां, अगर चांस मिल जए तो..............।
अरे बड़ी गन्दी लाइन है, कुछ और काम करो न ।
कहां मिलता है काम ! एक फिल्म लाइन है जहां योग्यता धरी रह जाती है बस किस्मत चलती है ।
अरे दुनिया में हजारों काम है ।
मगर फिल्म लाइन में क्या बुराई है ?
क्या बुराई नहीं यह पूछो । तुम तो रोज मजे करते फिरोगे, बीबी सिर पकड़कर नसीब को रोएगी ।
बीबी है ही नहीं तो रोएगी कहां से ! वह हंसा ।
कभी तो आयेगी ।
क्या आएगी ? मैं शादी हीं नहीं करूंगा ।
हाय राम, घर नहीं बसाओगे । मंगला अपनी धुन में कहती चली जा रही थी । उसे एकाएक ऎसी बातें नहीं छेड़नी चाहिए थी ।
चाय लोगे कि कुछ ठंडा ?
जी, अब चलूंगा।
वह खड़ा हो गया ।
अरे बैठो न.........उसने फरीद का आस्तीन पकड़कर बैठा लिया । जब उसने व्हिस्की पेश की तो फरीद सिटपिटा गया ।
क्यों, पियो न बहुत जरा सी दी है मैंने ।
नहीं । फरीद तकल्लुफ करने लगा ।
अरे इतना बड़ा ताड़ सरीखा हो गया । क्या अभी तक दूध ही पीता हैं मंगला मूड में थी ।
डैडी.. वह झिझक गया ।
तेरे डैडी नहीं पीते ? खूब पीते है । कभी तुझे नहीं पिलाई ? सच्ची कि झूठ बोल रहा है ?
फरीद हंसने लगा, यार दोस्तों के साथ चखी तो है ।
तो बस, लो दो बूंद तो है ही । बड़े तक्ल्लुफ से उसने गिलास ले लिया ।

_____________________________________
इन्सानी रिश्तों के नाजुक पहलुओ पर अभिनय करते-करते वह यह याद न रख सके कि यह मात्र एक्टिंग है और कुछ नहीं ? और बस अन्दर ही अन्दर एक नई प्रणय कथा पनपने लगी....एसी परिस्थितियां जिन्होंने न केवल धर्म को ही अजीब आदमी बना डाला, बल्कि जरीना भी एक रहस्य बनकर रह गई.................

साभार : अज़ीब आदमी - इस्मत चुग़ताई

अब चँद अल्फ़ाज़ मेरे भी :
झकरोर देने वाला उपन्यास-अँश, यही न ? ऎसा ही कुछ पिछले दिनों डा. अनुराग आर्य से बातचीत के दौरान हमने महसूस किया कि जो कुछ हम पढ़ते हैं, या पढ़ चुके हैं.. वह फौरी तौर पर आपको अपसेट कर देते हैं, कुछ हफ़्तों तक यादों में बसे रहते हैं, बाद के महींनों में वह आपको हॉन्ट तो करते हैं, पर जैसे धुँधले साये की मानिंद । वह हूबहू   अपनी शक्लो सूरत के साथ दिमाग में नहीं चढ़ते, बस अपने होने की ताक़ीद करते रहते हैं, " जरा याद करो, तुमने मुझे पढ़ा था " गोया आपकी बिसरी हुई महबूबा रिश्तों के गुज़र-बीतने का याकि भुला दिये जाने का उलाहना दे रही हो । जैसे वह बेवफ़ाई की लानतें भेज रहीं हों कि, कभी मैंनें इन लफ़्ज़ों के जरिये तुम्हारे ज़ज़्बातों को सींच सींच कर इस मुकाम पर ला खड़ा किया, और.. तुम ? अलसाये हुये तन्हा लम्हों में आप उस तक पहुँचना चाहते हैं, उसे दुबारा सहला कर अपने को ताज़ा करना चाहते हैं, पर आलस का अपना एक अलग  तक़ाज़ा आपको बेबस किये रहता है, " तुम शायद पीछे कमरे के सेल्फ़ में पड़ी होगी, इस मुई आलस से फ़ारिग़ होकर मैं तुम तक बस पहुँचता ही हूँ !"
उन सफ़हों से जिन्होंने हमें सहारा दिया, ऎसे ऎसे ज़ज़्बे दिये कि हम हँस पड़े तो रोये भी हैं, हमारे नाशुक्रेपन की यह बातें आयी गयी हो जाती हैं । तो.. अनुराग से बातचीत में सोचा यह गया कि अग़र हम ऎसा कुछ पढ़ें, तो उसे नेट के किसी कोने पर दर्ज़ कर दिया करें, यही एक ऎसा ज़रिया है कि, हम हिन्दोस्ताँ में पढ़े सफ़हे, तलब लगने पर कनाडा में भी हासिल कर सकते हैं । वाह, क्या बात है.. और हमने एक दूसरे से विदा ली ! इस दरम्यान तमाम समय मुझे इस्मत आपा का यह अज़ीब आदमी याद आता रहा । इसे पिछले 15 सालों में मैंनें तकरीबन 20 बार तो पढ़ा ही होगा, जबकि बीच बीच में इसके पन्नों का उलटते रहना इसमें शामिल नहीं है । इस क़दर कि मेरी दुर्गा-सप्तशती की तरह यह भी बेशुमार पैबन्दों के सहारे मेरे पास बावस्ता है । इसकी एक और भी वज़ह है, उसका खुलासा इन लाइनों के बाद..
जब यह एक उर्दू रिसाले में सिलसिलेवार छप रहा था, उसी समय से यह कयास लगने लगा कि इस अफ़साने के किरदारों में..  ज़रीना शायद वहीदा रहमान हैं
मँगला गीता दत्त को मान लीजिये ( उन दिनों का उनका गाया गीत ’ आज सज़न मोहे अँग लगा ले, जनम सफल हो जाये, हिरदै की पीड़ा प्रेम की अग्नी.. " दर्द की कुदरती शिद्दत के साथ आज भी मुझे उतना ही परेशान करती है, जितना गीतादत्त को उनकी तन्हाईयों और रुसवाईयों ने किया होगा )
धर्म को गुरुदत्त न मानने की लोगों ने कोई वज़ह न देखी ।
वक़्त के पहले की सोच पर चलने वाले गुरुदत्त मेरे पसँदीदा तो हैं ही, ग़र वह इस्मत आपा की कलम से मौज़ूँ हुये हों.. तो फिर इस नॉवेल को पैबन्दों के सहारे कौन न ज़िन्दा रखना चाहेगा ?
और फ़रीद ? फ़रीद मैं आप पर छोड़ता हूँ !

 

 

इससे आगे
इन रचनाओं के यहाँ होने का मतलब
अँतर्जाल एवं मुद्रण से समकालीन साहित्य के
चुने हुये अँशों का अव्यवसायिक सँकलन

(संकलक एवं योगदानकर्ता के निताँत व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर सँग्रह !
आवश्यक नहीं, कि पाठक इसकी गुणवत्ता से सहमत ही हों )

उत्तम रचनायें सुझायें, या भेजे !

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