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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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25 February 2010

चूल्हे भाड में जाय यह चाहत - चाह के हाथों किसी को सुख नहीं

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मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच .. उधर  हमको नींद सताती थी, और की सुनिये । अब तक जो पढ़ा सो यह था कि मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का मिलना था कि छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड कर जैसे थे वैसे हो गए ।
कोताह यह कि पानी के छींटों के परताप से इस किस्से की रवानगी आगे बढ़ चलती है और यह कहानी हरकत में आती है, इस तरह कि.. " गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बडी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घडा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंडवाते ही ओले पडे थे । राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खडे हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए ।"
सैय्यद ईँशा अल्लाह खाँ साहब इस करतब को बयान करने के बाद जो लिखते हैं, वह सुनो..

राजा इंदर और महेंदर गिर कुँवर उदैभान और राजा सूरजभान और रानी लक्ष्मीबास को लेकर एक उड न-खटोलो पर बैठकर बडी धूमधाम से उनको उनके राज पर बिठाकर ब्याह का ठाट करने लगे । पसेरियन हीरे-मोती उन सब पर से निछावर हुए । राजा सूरजभान और कुँवर उदैभान और रानी लछमीबास चितचाही असीस पाकर फूली न समाई और अपने सो राज को कह दिया-जेवर भोरे के मुंह खोल दो । जिस जिस को जो जा उकत सूझे, बोल दो । आज के दिन का सा कौन सा दिन होगा । हमारी आँखों की पुतलियों से जिससे चैन हैं, उस लाडले इकलौते का ब्याह और हम तीनों का हिरनों के रूप से निकलकर फिर राज पर बैठना । पहले तो यह चाहिए जिन जिन की बेटियाँ बिन ब्याहियाँ हों, उन सब को उतना कर दो जो अपनी जिस चाव चीज से चाहें; अपनी गुडियाँ सँवार के उठावें; और तब तक जीती रहें, सब की सब हमारे यहाँ से खाया पकाया रींधा करें । और सब राज भर की बेटियाँ सदा सुहागनें बनी रहें और सूहे रातें छुट कभी कोई कुछ न पहना करें और सोने रूपे के केवाड गंगाजमुनी सब घरों में लग जाएँ और सब कोठों के माथे पर केसर और चंदन के टीके लगे हों । और जितने पहाड हमारे देश में हों, उतने ही पहाड सोने रूपे के आमने सामने खडे हो जाएँ और सब डाँगों की चोटियाँ मोतियों की माँग ताँगे भर जाएँ; और फूलों के गहने और बँधनवार से सब झाड पहाड लदे फँदे रहें; और इस राज से लगा उस राज तक अधर में छत सी बाँध दो । और चप्पा चप्पा कहीं ऐसा न रहें जहाँ भीड भडक्का धूम धडक्का न हो जाय । फूल बहुत सारे बहा दो जो नदियाँ जैसे सचमुच फूल की बहियाँ हैं यह समझा जाय । और यह डौल कर दो, जिधर से दुल्हा को ब्याहने चढे सब लाड ली और हीरे पन्ने पोखराज की उमड में इधर और उधर कबैल की टट्टियाँ बन जायँ और क्यारियाँ  जिनके बीचो बीच से हो निकलें । और कोई डाँग और पहाडी तली का चढाव उतार ऐसा दिखाई न दे जिसकी गोद पंखुरियों से भरी हुई न हों ।

इस धूमधाम के साथ कुँवर उदैभान सेहरा बाँधे दूल्हन के घर तक आ पहुँचा और जो रीतें उनके घराने में चली आई थीं, होने लगियाँ । मदनबान रानी केतकी से ठठोली करके बोली- लीजिए, अब सुख समेटिए, भर भर झोली । सिर निहुराए, क्या बैठी हो, आओ न टुक हम तुम मिल के झरोखों से उन्हें झाँकें । रानी केतकी ने कहा- न री, ऐसी नीच बातें न कर । हमें ऐसी क्या पडी जो इस घडी ऐसी झेल कर रेल पेल ऐसी उठें और तेल फुलेल भरी हुई उनके झाँकने को जा खडी हों । बदनबान उसकी इस रूखाई को उड़नझाई की बातों में डालकर बोली-  बोलचाल मदनबान की अपनी बोली के दोनों में-

यों तो देखो वाछडे जी वाछडे जी वाछडे । हम से जो आने लगी हैं आप यों मुहरे कडे ॥
छान मारे बन के बन थे आपने जिनके लिये । वह हिरन जीवन के मद में हैं बने दूल्हा खडे ॥
तुम न जाओ देखने को जो उन्हें क्या बात है । ले चलेंगी आपको हम हैं इसी धुन पर अडे ।
है कहावत जी को भावै और यों मुडिया हिले । झांकने के ध्यान में उनके हैं सब छोटे बडे ।।
साँस ठंडी भरके रानी केतकी बोली कि सच । सब तो अच्छा कुछ हुआ पर अब बखेडे में पडे ॥

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वारी फेरी होना मदनबान का रानी केतकी पर और उसकी बास सूँघना और उनींदे पन से ऊंघना उस घडी मदनबान को रानी केतकी का बादले का जूडा और भीना भीनापन और अँखडियों का लजाना और बिखरा बिखरा जाना भला लग गया, तो रानी केतकी की बास सूँघने लगी और अपनी आँखों को ऐसा कर लिया जैसे कोई ऊँघने लगता है । सिर से लगा पाँव तक वारी फेरी होके तलवे सुहलाने लगी । तब रानी केतकी झट एक धीमी सी सिसकी लचके के साथ ले ऊठी : मदनबान बोली-मेरे हाथ के टहोके से, वही पांव का छाला दुख गया होगा जो हिरनों की ढूँढने में पड गया था। इसी दु:ख की चुटकी से रानी केतकी ने मसोस कर कहा-काटा - अडा तो अडा, छाला पडा तो पडा, पर निगोडी तू क्यों मेरी पनछाला हुई ।

सराहना रानी केतकी के जोबन का केतकी का भला लगना लिखने पढने से बाहर है । वह दोनों भैवों का खिंचावट और पुतलियों में लाज की समावट और नुकीली पलकों की रूँ धावट हँसी की लगावट और दंतडियों में मिस्सी की ऊदाहट और इतनी सी बात पर रूकावट है । नाक और त्योरी का चढा लेना, सहेलियों को गालियाँ देना और चल निकलना और हिरनों के रूप में करछालें मारकर परे उछलना कुछ कहने में नहीं आता । सराहना कुँवर जी के जोबन का कुँवर उदैभान के अच्छेपन का कुछ हाल लिखना किससे हो सके । हाय रे उनके उभार के दिनों का सुहानापन, चाल ढाल का अच्छन बच्छन, उठती हुई कोंपल की काली फबन और मुखडे का गदराया हुआ जोबन जैसे बडे तड के धुंधले के हरे भरे पहाडों की गोद से सूरज की किरनें निकल आती हैं । यही रूप था । उनकी भींगी मसों से रस टपका पडता था । अपनी परछाँई देखकर अकडता जहाँ जहाँ छाँव थी, उसका डौल ठीक ठीक उनके पाँव तले जैसे धूप थी ।

दूल्हा का सिंहासन पर बैठना दूल्हा उदैभान सिंहासन पर बैठा और इधर उधर राजा इंदर और जोगी महेंदर गिर जम गए और दूल्हा का बाप अपने बेटे के पीछे माला लिये कुछ गुनगुनाने लगा । और नाच लगा होने और अधर में जो उड़न खटोले राजा इंदर के अखाडे के थे । सब उसी रूप से छत बाँधे थिरका किए । दोनों महारानियाँ समधिन बन के आपस में मिलियाँ चलियाँ और देखने दाखने को कोठों पर चन्दन के किवाडों के आड तले आ बैठियाँ । सर्वाग संगीत भँड ताल रहस हँसी होने लगी । जितनी राग रागिनियाँ थीं, ईमन कल्यान, सुध कल्यान झिंझोटी, कन्हाडा, खम्माच, सोहनी, परज, बिहाग, सोरठ, कालंगडा, भैरवी, गीत, ललित भैरी रूप पकडे हुए सचमुच के जैसे गाने वाले होते हैं, उसी रूप में अपने अपने समय पर गाने लगे और गाने लगियाँ । उस नाच का जो ताव भाव रचावट के साथ हो, किसका मुंह जो कह सके । जितने महाराजा जगतपरकास के सुखचैन के घर थे, माधो बिलास, रसधाम कृष्ण निवास, मच्छी भवन, चंद भवन सबके सब लप्पे लपेटे और सच्ची मोतियों की झालरें अपनी अपनी गाँठ में समेटे हुए एक भेस के साथ मतवालों के बैठनेवालों के मुँह चूम रहे थे ।

पर कुंवर जी का रूप क्या कहूं । कुछ कहने में नहीं आता। न खाना, न पीना, न मग चलना, न किसी से कुछ कहना, न सुनना । जिस स्थान में थे उसी में गुथे रहना और घडी-घडी कुछ सोच सोच कर सिर धुनना । होते-होते लोगों में इस बात का चरचा फैल गई । किसी किसी ने महाराज और महारानी से कहा - कुछ दाल में काला है । वह कुंवर बुरे तेवर और बेडौल आंखें दिखाई देती हैं । घर से बाहर पांव नहीं धरना । घरवालियां जो किसी डौल से बहलातियां हैं, तो और कुछ नहीं करना, ठंडी ठंडी सांसें भरता है । और बहुत किसी ने छेडा तो छपरखट पर जाके अपना मुंह लपेट के आठ आठ आंसू पडा रोता है । यह सुनते ही कुंवर उदैभान के माँ-बाप दोनों दौड आए । गले लगाया, मुंह चूम पांच पर बेटे के गिर पडे हाथ जोडे और कहा -

जो अपने जी की बात है सो कहते क्यों नहीं ? क्या दुखडा है जो पडे-पडे कहराते हो ? राज-पाट जिसको चाहो दे डालो । कहो तो क्या चाहते हो ? तुम्हारा जी क्यों नहीं लगता ? भला वह क्या है जो नहीं हो सकता ? मुंह से बोलो जी को खोलो । जो कुछ कहने से सोच करते हों, अभी लिख भेजो । जो कुछ लिखोगे, ज्यों की त्यों करने में आएगी । जो तुम कहो कुंए में गिर पडो, तो हम दोनों अभी गिर पडते हैं । कहो - सिर काट डालो, तो सिर अपने अभी काट डालते हैं । कुंवर उदैभान, जो बोलते ही न थे, लिख भेजने का आसरा पाकर इतना बोले - अच्छा आप सिधारिए, मैं लिख भेजता हूं । पर मेरे उस लिखे को मेरे मुंह पर किसी ढब से न लाना । इसीलिए मैं मारे लाज के मुखपाट होके पडा था और आपसे कुछ न कहना था । यह सुनकर दोनों महाराज और महारानी अपने स्थान को सिधारे । तब कुंवर ने यह लिख भेजा - अब जो मेरा जी होंठों पर आ गया और किसी डौल न रहा गया और आपने मुझे सौ-सौ रूप से खोल और बहुत सा टटोला, तब तो लाज छोड के हाथ जोड के मुंह फाड के घिघिया के यह लिखता हूं-

चाह के हाथों किसी को सुख नहीं । है भला वह कौन जिसको दुख नहीं ॥ उस दिन जो मैं हरियाली देखने को गया था, एक हिरनी मेरे सामने कनौतियां उठाए आ गई । उसके पीछे मैंने घोडा बगछुट फेंका । जब तक उजाला रहा, उसकी धुन में बहका किया । जब सूरज डूबा मेरा जी बहुत ऊबा । सुहानी सी अमराइयां ताड के मैं उनमें गया, तो उन अमराइयों का पत्ता-पत्त्ता मेरे जी का गाहक हुआ । वहां का यह सौहिला है । कुछ रंडियां झूला डाले झूल रही थीं । उनकी सिरधरी कोई रानी केतकी महाराज जगतपरकास की बेटी हैं । उन्होंने यह अंगूठी अपनी मुझे दी और मेरी अंगूठी उन्होंने ले ली और लिखौट भी लिख दी । सो यह अंगूठी लिखौट समेत मेरे लिखे हुए के साथ पहुंचती है -

अब आप पढ लीजिए । जिसमें बेटे का जी रह जाय, सो कीजिए । महाराज और महारानी ने अपने बेटे के लिखे हुए पर सोने के पानी से यों लिखा - हम दोनों ने इस अंगूठी और लिखौट को अपनी आंखों से मला । अब तुम इतने कुछ कुढो पचो मत । जो रानी केतकी के मां बाप तुम्हारी बात मानते हैं, तो हमारे समधी और समधिन हैं । दोनों राज एक हो जाएंगे । और जो कुछ नांह - नूंह ठहरेगी तो जिस डौल से बन आवेगा, ढाल तलवार के बल तुम्हारी दुल्हन हम तुमसे मिला देंगे । आज से उदास मत रहा करो । खेलो, कूदो, बोलो चालो, आनंदें करो । अच्छी घडी- शुभ मुहूरत सोच के तुम्हारी ससुराल में किसी ब्राह्मन को भेजते हैं; जो बात चीत चाही ठीक कर लावे और शुभ घडी शुभ मुहूरत देख के रानी केतकी के मां-बाप के पास भेजा । ब्राह्मन जो शुभ मुहूरत देखकर हडबडी से गया था, उस पर बुरी घडी पडी । सुनते ही रानी केतकी के मां-बाप ने कहा - हमारे उनके नाता नहीं होने का ।

भला उनके नाता होने से मेरा क्या लेना देना - सो भाई अपने कौतूहल को अभी लगाम लगावो । ,उधर केतकी की कहानी खतम होने का कोई डौल नहीं दिखता, और इधर मशीन की लिखौट करने से मेरी ऊँगलियाँ भी थकी जाती हैं । अगली बारी तक.. अपने हिय में धीर रखो, बाकी का किस्सा जल्द पूरा हुआ चाहता है ।

इससे आगे

22 February 2010

गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा

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यह किस्सा गोरख जागा, मुंछदर जागा  और  मुंछदर भागा तक पहुँचाया, और  धीरे धीरे ऎसे अड़चन आन पड़ी और ऎसी बान बनी  कि हिरदय में एक छिन को लगता रानी केतकी की पूरी कहानी मेरे पन्नों पर कभी  उतर कर न आ पावेगी । जिस घडी इसे पूरी करने की ठानता, एक न एक मुसीबतें आ खड़ी होती,  मेरे सभी सोचे पर धूल मट्टी डाल कर सँग उड़ा ले जाती । गिनती के मेरे कदरदान मन में यह बैन करते कि मुआ मुँछदर भागा तो भागा अपने साथ साथ बाकी बचे किस्से को भी उड़ा ले गया । लाख लाख किरपा गुरु महराज की अब दुबारा से इस अधूरे किस्सा-बयानी को अदा करने का डौल लग रहा है । मत्था टेक कर दोहाई भैरोनाथ की अब बाकी का यह काम अँजाम होकर मुझे सूरज की गरमी में चाँद की सी ठँडक पहुँचाये । -अरज़मँद डा.अमर कुमार              ..

(  चाल हिन्दवी की - बयान माफ़ीनामा गैरहाज़िरी का  और तर्ज़ इँशा अल्ला खाँ  का )

rani-ketki-madhubani  तो, मित्रों भला अधूरी क्यों रह जाये यह’ रानी केतकी की कहानी ? अब आगे बढ़ते हैं

एक आंख की झपक में ( मुँछदर ) वहां आ पहुंचता है जहां दोनों महाराजों में लडाई हो रही थी । पहले तो एक काली आंधी आई; फिर ओले बरसे; फिर टिड्डी आई । किसी को अपनी सुध न रही । राजा सूरजभान के जितने हाथी घोडे और जितने लोग और भीडभाड थी, कुछ  न  समझा  कि  क्या  किधर  गई  और  उन्हें  कौन  उठा  ले  गया । राजा जगत परकास के लोगों पर और रानी केतकी के लोगों पर क्योडे की बूंदों की नन्हीं-नन्हीं फुहार सी पडने लगी । जब यह सब कुछ हो चुका, तो गुरुजी ने अतीतियों से कहा - उदैभान, सूरजभान, लछमीबास इन तीनों को हिरनी हिरन बना के किसी बन में छोड दो; और जो उनके साथी हों, उन सभों को तोड फोड दो । जैसा गुरुजी ने कहा, झटपट वही किया । विपत का मारा कुंवर उदैभान और उसका बाप वह राजा सूरजभान और उनकी मां लछमीबास हिरन हिरनी बन गए । हरी घास कई बरस तक चरते रहे; और उस भीड भाड का तो कुछ थल बेडा न मिला, किधर गए और कहां थे बस यहां की यहीं रहने दो ।

फिर सुनो । अब रानी केतकी के बाप महाराजा जगतपरकास की सुनिए । उनके घर का घर गुरु जी के पांव पर गिरा और सबने सिर झुकाकर कहा - महाराज, यह आपने बडा काम किया । हम सबको रख लिया । जो आप न पहुंचते तो क्या रहा था । सबने मर मिटने की ठान ली थी । महाराज ने कहा - भभूत तो क्या, मुझे अपना जी भी उससे प्यारा नहीं । मुझे उसके एक पहर के बहल जाने पर एक जी तो क्या जो  करोर  ( करोड़ ) जी हों तो दे डालें । रानी केतकी को डिबिया में से थोडा सा भभूत दिया । कई दिन तलक भी आंख मिचौवल अपने माँ-बाप के सामने सहेलियों के साथ खेलती सबको हँसाती रही, जो सौ सौ थाल मोतियों के निछावर हुआ किए, क्या कहूँ, एक चुहल थी जो कहिए तो करोडों पोथियों में ज्यों की त्यों न आ सके । रानी केतकी का चाहत से बेकल होना और मदन बान का साथ देने से नहीं करना । एक रात रानी केतकी उसी ध्यान में मदनबान से यों बोल उठी-अब मैं निगोडी लाज से कुट करती हूँ, तू मेरा साथ दे । मदनबान ने कहा-क्यों कर ? रानी केतकी ने वह भभूत का लेना उसे बताया और यह सुनाया यह सब आँख-मिचौवल के झाई झप्पे मैंने इसी दिन के लिये कर रखे थे । मदनबान बोली-मेरा कलेजा थरथराने लगा । अरी यह माना जो तुम अपनी आँखों में उस भभूत का अंजन कर लोगी और मेरे भी लगा दोगी तो हमें तुम्हें कोई न देखेगा । और हम तुम सबको देखेंगी । पर ऐसी हम कहाँ जी चली हैं । जो बिन साथ, जोबन लिए, बन-बन में पडी भटका करें और हिरनों की सींगों पर दोनों हाथ डालकर लटका करें, और जिसके लिए यह सब कुछ है, सो वह कहाँ ? और होय तो क्या जाने जो यह रानी केतकी है और यह मदनबान निगोडी नोची खसोटी उजडी उनकी सहेली है । चूल्हे और भाड में जाय यह चाहत जिसके लिए आपकी माँ-बाप को राज-पाट सुख नींद लाज छोड कर नदियों के कछारों में फिरना पडे, सो भी बेडौल । जो वह अपने रूप में होते तो भला थोडा बहुत आसरा था । ना जी यह तो हमसे न हो सकेगा ।

जो महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता का हम जान-बूझकर घर उजाडें और इनकी जो इकलौती लाडली बेटी है, उसको भगा ले जायें और जहाँ तहाँ उसे भटकावें और बनासपत्ति खिलावें और अपने घोडें को हिलावें । जब तुम्हारे और उसके माँ बाप में लडाई हो रही थी और उनने उस मालिन के हाथ तुम्हें लिख भेजा था जो मुझे अपने पास बुला लो, महाराजों को आपस में लडने दो, जो होनी हो सो हो; हम तुम मिलके किसी देश को निकल चलें; उस दिन समझीं । तब तो वह ताव भाव दिखाया । अब जो वह कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप तीनों जी हिरनी हिरन बन गए। क्या जाने किधर होंगे । उनके ध्यान पर इतनी कर बैठिए जो किसी ने तुम्हारे घराने में न की, अच्छी नहीं । इस बात पर पानी डाल दो; नहीं तो बहुत पछताओगी और अपना किया पाओगी । मुझसे कुछ न हो सकेगा । तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती, तो मेरे मुँह से जीते जी न निकलता । पर यह बात मेरे पेट में नहीं पच सकती । तुम अभी अल्हड हो । तुमने अभी कुछ देखा नहीं । जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूँगी तो तुम्हारे बाप से कहकर यह भभूत जो बह गया निगोडा भूत मुछंदर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूँगी । रानी केतकी ने यह रूखाइयाँ मदनबान की सुन हँ सकर टाल दिया और कहा-जिसका जी हाथ में न हो, उसे ऐसी लाखों सूझती है; पर कहने और करने में बहुत सा फेर है । भला यह कोई अँधेर है जो माँ बाप, रावपाट, लाज छोड कर हिरन के पीछे दौडती करछालें मारती फिरूँ । पर अरी ते तो बडी बावली चिडिया है जो यह बात सच जानी और मुझसे लडने लगी । रानी केतकी का भभूत लगाकर बाहर निकल जाना और सब छोटे बडों का तिलमिलाना दस पन्द्रह दिन पीछे एक दिन रानी केतकी बिन कहे मदनबान के वह भभूत आँखों में लगा के घर से बाहर निकल गई । कुछ  कहने  में  आता  नहीं, जो  मां-बाप  पर  हुई । सबने यह बात ठहराई, गुरूजी ने कुछ समझकर रानी केतकी को अपने पास बुला लिया होगा ।

महाराज जगतपरकास और महारानी कामलता राजपाट उस वियोग में छोड छाड के पहाड की चोटी पर जा बैठे और किसी को अपने आँखों में से राज थामने को छोड गए । बहुत दिनों पीछे एक दिन महारानी ने महाराज जगतपरकास से कहा-रानी केतकी का कुछ भेद जानती होगी तो मदनबान जानती होगी । उसे बुलाकर तो पूँछो । महाराज ने उसे बुलाकर पूछा तो मदनबान ने सब बातें खोलियाँ । रानी केतकी के माँ बाप ने कहा-अरी मदनबान, जो तू भी उसके साथ होती तो हमारा जी भरता । अब तो वह तुझे ले जाये तो कुछ हचर पचर न कीजियो, उसको साथ ही लीजियो । जितना भभूत है, तू अपने पास रख । हम कहाँ इस राख को चूल्हें में डालेंगे । गुरूजी ने तो दोनों राज का खोज खोया-कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप दोनों अलग हो रहे । जगतपरकास और कामलता को यों तलपट किया । भभूत न होत तो ये बातें काहे को सामने आती । मदनबान भी उनके ढूँढने को निकली । अंजन लगाए हुए रानी केतकी रानी केतकी कहती हुई पडी फिरती थी । फुनगे से लगा जड तलक जितने झाड झंखाडों में पत्ते और पत्ती बँधी थीं, उनपर रूपहरी सुनहरी डाँक गोंद लगाकर चिपका दिया और सबों को कह दिया जो सही पगडी और बागे बिन कोई किसी डौल किसी रूप से फिर चले नहीं । और जितने गवैये, बजवैए, भांड-भगतिए रहस धारी और संगीत पर नाचने वाले थे, सबको कह दिया जिस जिस गाँव में जहाँ हों अपनी अपनी ठिकानों से निकलकर अच्छे-अच्छे बिछौने बिछाकर गाते-नाचते घूम मचाते कूदते रहा करें । ढूँढना गोसाई महेंदर गिर का कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप को, न पाना और बहुत तलमलाना यहाँ की बात और चुहलें जो कुछ है, सो यहीं रहने दो ।

अब आगे यह सुनो। जोगी महेंदर और उसके 90 लाख जतियों ने सारे बन के बन छान मारे, पर कहीं कुँवर उदैभान और उसके माँ-बाप का ठिकाना न लगा । तब उन्होंने राजा इंदर को चिट्ठी लिख भेजी । उस चिट्ठी में यह लिखा हुआ था-इन तीनों जनों को हिरनी हिरन कर डाला था । अब उनको ढूँढता फिरता हूँ । कहीं नहीं मिलते और मेरी जितनी सकत थी, अपनी सी बहुत कर चुका हूं । अब मेरे मुंह से निकला कुँवर उदैभान मेरा बेटा मैं उसका बाप और ससुराल में सब ब्याह का ठाट हो रहा है । अब मुझपर विपत्ति गाढी पडी जो तुमसे हो सके, करो । राजा इंदर चिट्ठी का देखते ही गुरू महेंदर को देखने को सब इंद्रासन समेट कर आ पहुँचे और कहा-जैसा आपका बेटा वैसा मेरा बेटा । आपके साथ मैं सारे इंद्रलोक को समेटकर कुँवर उदैभान को ब्याहने चढूँगा । गोसाई महेंदर गिर ने राजा इंद से कहा-हमारी आपकी एक ही बात है, पर कुछ ऐसा सुझाइए जिससे कुँवर उदैभान हाथ आ जावे । राजा इंदर ने कहा-जितने गवैए और गायनें हैं, उन सबको साथ लेकर हम और आप सारे बनों में फिरा करें। कहीं न कहीं ठिकाना लग जाएगा । गुरू ने कहा-अच्छा । हिरन हिरनी का खेल बिगडना और कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप का नए सिरे से रूप पकड ना एक रात राजा इंदर और गोसाई महेंदर गिर निखरी हुई चाँदनी में बैठे राग सुन रहे थे, करोडों हिरन राग के ध्यान में चौकडी भूल आस पास सर झुकाए खडे थे । इसी में राजा इंदर ने कहा-इन सब हिरनों पर पढ के मेरी सकत गुरू की भगत फूरे मंत्र ईश्वरोवाच पढ के एक छींटा पानी का दो । क्या जाने वह पानी कैसा था ।  छीटों के साथ ही कुँवर उदैभान और उसके माँ बाप तीनों जनें हिरनों का रूप छोड कर जैसे थे वैसे हो गए । गोसाई महेंदर गिर और राजा इंदर ने उन तीनों को गले लगाया और बडी आवभगत से अपने पास बैठाया और वही पानी घडा अपने लोगों को देकर वहाँ भेजवाया जहाँ सिर मुंडवाते ही ओले पडे थे । राजा इंदर के लोगों ने जो पानी की छीटें वही ईश्वरोवाच पढ के दिए तो जो मरे थे सब उठ खडे हुए; और जो अधमुए भाग बचे थो, सब सिमट आए ।

देखता हूँ कि यह किस्सा लम्बा होता जाता है, ये बात उनसे कहो जिनने इस किस्से को बयान किया । कोई कोई का समय दिन का होगा तो वह रात को पढ़ेगा और किसी की रात बीतती होवेगी तो वह दिन को भी पढ़ लेगा । पर अब  इसको आपके सामने रखने में मेरी रात गहराती जाती है, कुछ नींद भी आती है । सो आज यहीं रहने दो, बाकी अगली बार

इससे आगे

4 February 2010

जोशिम ओर फुग्गो की बिरादरी

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सोचता   हूँ  कविता को परिभाषा  कितनी कठिन होगी ...  ...नियम हिज्जे के कानून ख्याल   को  कैसे   बाँध सकते  है  .....अक्सर जब ख्यालो  की रवानगी रुक  जाती है तो कंप्यूटर के दरवाजे खटखटाता हूँ ...लोगो को मुश्किलें होती होगी पर मुझे अक्सर मन चाहा मिल जाता है....जोशिम ऐसे ही एक खयालो के  जंगल  में घूमते आवारा बंजारे से है ...जिनके झोले में ढेरो जादुई फलसफे है ....आप उन्हें जितनी बार पढेगे नया सा कुछ मिलेगा ....कोर्स की किताब जैसा .......


किताब-हिसाब !

याने अफसाना नंबर दो ; उर्फ़ जहाज का पंछी; उर्फ़ घुमक्कड़नामा - एक]

क्या किया? क्या ना किया?, किस भीड़ से कथनी निकाली
क्यों थमे? कब चल पड़े? बहते बसर, सैलाब से अटकल मिलाली
कुछ इस तरह बस्तों ने शब्दों से वफ़ा ली

इतने इलाके घूम-चक्कर
बैठ घर दम फूलता
प्रतिरोध का ऊबा लड़कपन
पोस्टरों सा झूलता

हाँ दबदबा दब सा गया
जब लीक में बूड़े महल
पर शोर डूबे हैं नहीं
तैयार हैं, जब हो पहल

बेढब सफ़ों में मिर्च डाली, हो सका जितना नयी कोशिश निकाली
इंतजारों में खलल की फिक्र फेंकी, चुहल में कदमों से दो मंजिल जुड़ाली
हाँ इस तरह ......

यारों की भी, थी सूरतें,
ईमारतें रहमो करम
पर भागते कांटे रहे
भरते भरे बोरों शरम

कुछ भरम छूटे हाथ रूठे
किस्मतें घुलती रहीं
आवारगी आंखों की जानिब
उम्र संग ढलती रहीं

जिस आँख से चकमक मिले, उनकी पकड़ धक्-धक् सम्हाली,
कुछ मौन से, कुछ फोन से, बतझड़ भरे, रहबर मिली होली-दिवाली
हाँ इस तरह ......

सब खोह में मौसम न थे ,
कुछ काम भटके जाप थे
ताने सुने बाने बुने
हिस्सों में बंट कुछ शाप थे

कुछ रंग कुछ जोबन करा
कुछ झाड़ डैने छुप धरा
छौंके हुए अफ़सोस ने
कायम सा कुछ रोगन भरा

हिम्मत भी जैसी जस मिली, वो हौसलों में नींव डाली
ताली-दे-ताली पैर पटके, ढोल पीटे, हिनहिना सीटी बजा ली
हाँ इस तरह ......


ओर यहाँ वे किसी नियम से बंधे नहीं है ......अपनी रवानगी में अपने स्टाइल में ......अपने बिंदास अंदाज में ..खास तौर में जिस तरीके से वे कुछ  शब्दों का इस्तेमाल करते है ......जैसे कविता के नीचे लिखे शब्द........

कोट पीस दफ्तरी
उर्फ़ नौकरी की छनी खीज - - दोस्तों के शब्दों में - नग़्मा- ए- ग़म-ए-रोज़गार ]

कमख़्वाब नींद, कमनज़र ख़्वाब, डर मुंह्जबानी
ऊबे निश्वास, भटके विश्वास, उफ़ किस्से-कहानी

सुबह होड़-दौड़, शाम आग-भाग, कौतुकी खट राग,
मृगया मशक्कत, दीवानी कसरत, धौंस पहलवानी

कूद-कूद ढाई घर, बैठ सवा तीन, बिसात रंगीन
मग़ज़ घोर शोर, रीढ़ कमज़ोर, गुज़र-नौजवानी

फा़ईल खींच-खांच, नोटशीट तान, फ़र्शी गुन गान
रग-रग पे खून, खालिस नून-चून, रंग साफ़-पानी

नमश्कार-पुरश्कार, आदाब-अस्सलाम, सादर-परनाम
ठस आलमपनाह, हुकुम बादशाह, चिड़ी की रानी


ओर ये मेरी फेवरेट है ....जाने क्यों मुझे बेहद पसंद है .....जाने क्यों.........

फुग्गो की बिरादरी

क्या अभी भी यार तुम, शामें उड़ाते हो ?

चौंकते हो रात में
परछाईयों को बूझते हो,
पलट कम्बल मुंह उलट
लम्बाईयों में ऊंघते हो,
दिन सुने किस्से कहानी
नित अकेले सूंघते हो,
और फ़िर तख्ता पलट कर
चोर मन में गूंधते हो

क्या गुल्लकों में डर डरे नीदें जगाते हो ?
क्या अभी भी ....

तुम, तुम के आने से
अभी कुप्प फूलते हो क्या,
तभी तो सज संवर पुर जोर
मिस्टर कूदते हो क्या,
फुदक कर बात, बातों में
शरम से सूजते हो क्या,
और फ़िर तंज़ तानों से
तमक कर रूठते हो क्या,

क्या हक्लकाकर, मिचमिचा आँखें बनाते हो ?
क्या अभी भी .....

चिरोंजी छीलते हो
टेसुओं से रंग करते हो,
दबा कर पत्तियों को
तितलियों को तंग करते हो,
फकत झकलेट मौकों में
जबर की जंग करते हो,
बचा जो कुछ भी करते हो
सबर के संग करते हो,

तमातम फूँक कर सेमल के लब, फाहे बनाते हो ।
....
कहो न यार तुम इस दम तलक, कंचे लुकाते हो ।
....
कहो तो यार उन सीपों से तुम, कैरी छिलाते हो ।
....
फिर कहो अनकही सांसों से तुम, फुग्गे फुलाते हो ।

कहो ....


[प्यादे को पहलवान के .. आस पास ... बनने में अभी बहुत .. बहुत .. बहुत .. वक़्त है - (लेकिन लिखता कौन कमबख्त है सूरमा बनने के लिए) - उम्मीद से ज्यादा अपेक्षाओं( http://tarang-yunus.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html )का तहेदिल ... ]
इससे आगे
इन रचनाओं के यहाँ होने का मतलब
अँतर्जाल एवं मुद्रण से समकालीन साहित्य के
चुने हुये अँशों का अव्यवसायिक सँकलन

(संकलक एवं योगदानकर्ता के निताँत व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर सँग्रह !
आवश्यक नहीं, कि पाठक इसकी गुणवत्ता से सहमत ही हों )

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