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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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31 August 2009

हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी

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हमारी हिंदी, जिसे हम इतना प्यार करते हैं अपंग है, वह जन्म से विकलांग नहीं थी लेकिन उसका अंग-भंग कर दिया गया. वह बहुत बड़ी सियासत का शिकार हुई, अभी वह बड़ी हो ही रही थी कि 1947 में उसके हाथ-पैर काटके उसे भीख माँगने के लिए बिठा दिया गया.

करोड़ों लोगों की भाषा क्या हो, कैसी हो, उसमें काम किस तरह किया जाए, इसका फ़ैसला रातोरात दफ़्तरों में होने लगा.राजभाषा विभाग बना और लोग उस अपंग की कमाई खाने लगे जिसका नाम हिंदी है. ऐसा दुनिया में कहीं और नहीं हुआ

ठीक ऐसा ही ताज़ा-ताज़ा पैदा हुए पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी हुआ, वे जिस्म के कुछ हिस्से काट लाए थे बाक़ी सब अरबी-फ़ारसी वाले भाइयों से माँगने थे, उन्हें किसी तरह जोड़ा जाना था. पाकिस्तान जहाँ कोई उर्दू बोलने वाला नहीं था वहाँ उर्दू राष्ट्रभाषा बनी. पंजाबी, सिंधी, बलोच, पठान सबको उर्दू सीखना पड़ा. ऊपर से तुर्रा ये कि उर्दू का देहली, लखनऊ या भोपाल से कोई ताल्लुक नहीं है, वह तो जैसे पंजाब में पैदा हुई थी.

इधर भारत में मानो 'सुजला सुफला भूमि पर किसी यवन के अपने पैर कभी रखे ही नहीं, इस पावन भूमि की भाषा तो देवभाषा संस्कृत है. यहाँ सब कुछ पवित्र-पावन-वैदिक है, विदेशी आक्रमणकारी आए थे, कुछ सौ साल बाद मुसलमान और क्रिस्तान दोनों चले गए, अपनी भाषा भी वापस ले गए, हम वहीं आ गए जहाँ इनके आक्रमण से पहले थे, इन्हें  बुरा  सपना  समझकर  भूल  जाओ'...ऐसा कम-से-कम भाषा और संस्कृति में मामले में कभी नहीं हुआ. न हो सकता है.

भारत में सदियों से जो ज़बान बोली जा रही थी उसका  नाम  हिंदुस्तानी  था, लेकिन  मुसलमान  चूँकि 'अपनी उर्दू' पाकिस्तान ले गए थे इसलिए ज़रूरी था कि जल्द-से-जल्द बिना उर्दू हिंदुस्तानी यानी हिंदी के लिए जयपुर फुट तैयार हो जाए और वह चल पड़े, इसके लिए सबके आसान काम था पलटकर संस्कृत की तरफ़ देखना. वही हुआ, ऐसे-ऐसे भयानक प्रयोग हुए कि बेचारी अपंग हिंदी दोफाड़ हो गई. एक हिंदी जो लोग बोलते हैं, एक हिंदी जो दफ़्तरों में शब्दकोशों से देखकर लिखी जाती है.

नेहरू की भाषा कभी सुनिए जो ख़ालिस हिंदुस्तानी थी लेकिन उन पर भी शायद अँगरेज़ी का जुनून इस क़दर सवार था कि उन्हें अपनी हिंदुस्तानी की फिक्र नहीं रही. देश का धर्म के आधार पर विभाजन होने के बाद समझदारी दिखाते हुए उसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र घोषित किया गया, वहीं भाषा के मामले में ऐसा बचपना क्योंकर हुआ, समझ में नहीं आता.

भारत के विभाजन को साठ वर्ष पूरे होने वाले हैं. दुनिया का हर भाषाशास्त्री मानता है कि किसी भाषा को जड़ें जमाने में कई सौ वर्ष लगते हैं. ब्रज, अवधी, भोजपुरी के साथ अमीर खुसरो फ़ारसी मिला रहे थे, रसखान कृष्णभक्ति का माधुर्य घोल रहे थे, इनके बीच शेरशाह सूरी जैसे तुर्क-अफ़गान भी अपनी भाषा ले  आए  थे. इन  सबसे  मिलकर  एक  जादुई  ज़बान  बनने लगी जिसमें मीर-ग़ालिब-मोमिन-ज़ौक लिखने लगे, भारतेंदु-प्रेमचंद-रतननाथ सरसार-देवकीनंदन खत्री से लेकर मंटो, कृशनचंदर तक आए. एक सिलसिला बना था जो अचानक झटके से टूट गया.

एक ही रात में कई अपने शायर-कवि पराये हो गए, इधर भी-उधर भी. कई नए अंखुए उग आए जिन्होंने दावा किया कि वे सीधे जड़ से जुड़े हैं यानी संस्कृत या फ़ारसी से लेकिन उस भाषा का होश किसी को नहीं रहा जिसने उत्तर भारत में तीन-चार सौ साल में अपनी जगह बना ली थी और खूब परवान चढ़ रही थी. वह सबकी भाषा थी, जन-जन की भाषा थी, वह सहज पनपी थी, उसमें कोई बनावट नहीं थी, उसमें हिंदी-संस्कृत के शब्द थे, बोलियाँ-मुहावरे, ताने-मनुहार, दादरा, ठुमरी थी, अदालती ज़बान थी, जौजे-मौजे साक़िन, वल्द, रक़ीब, रक़बा था...क्या नहीं था.

एक ऐसी ज़बान जो मुग़लिया दौर में सारी ज़रूरतें पूरी कर रही थी और ठहर नहीं गई थी बल्कि आगे बढ़ रही थी, जिसने ज़रूरत भर अँगरेज़ी को भी अपनाया. उसमें अभी और बदलाव हो सकते थे, जो स्वाभाविक तरीक़े से होते जिनमें बनावट के कंकड़ न दिखते शायद. मगर दुर्भाग्य ये है कि देश के बँटने के साथ ही भाषा भी बँट गई और लोग एक नई भाषा गढ़ने में लग गए जो किसी की भाषा नहीं थी, नहीं रही है. यह एक बहुत बड़ी वजह है कि लोग हिंदी को मुश्किल मानकर त्याग देने में सुविधा महसूस करते हैं.

सच बात ये है कि अगर हिंदी को वाक़ई आम ज़बान बनाना है, सबकी बोली बनाना है तो उसे लोगों से दूर नहीं, नज़दीक ले जाना होगा. हिंदू हों या मुसलमान, जब कोई शिकायत होती है तो लोग यही कहते हैं कि हमें शिकायत है, फिर दिल्ली में बसों पर क्यों लिखा होता है कि "प्रतिवाद करने के लिए संपर्क करें"..

उर्दू और हिंदी से पहले एक भाषा है जिसने सारी ज़रूरतें पूरी कीं हिंदुस्तानी के रूप में, जो आज भी उत्तर भारत के रग-रग में बहती है. यह चिट्ठा उसी हिंदुस्तानी में लिखा गया है, उस हिंदी में नहीं जो 1947 में अपंग हुई उसके बाद दिन-ब-दिन इतनी बनावटी होती चली गई कि हिंदी बोलने वाला भी, लिखी हुई हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर नहीं पहचानता.

जब पंद्रह अगस्त धूमधाम से मनाइएगा तो याद रखिएगा कि यह हिंदुस्तानी की साठवीं बरसी भी है. साझे की सदियों की विरासत के लिए अगर सिर झुकाने का जज़्बा दिल में आए तो ऐसी भाषा बरतिए जो हिंदुस्तान की है, हिंदुस्तानी है.

साभार : अनामदास का चिट्ठा - ब्लागपोस्ट हमारी अपनी ज़बान की साठवीं बरसी 
प्रकाशित : 6 अगस्त 2007

ताज़्ज़ुब है कि, यह आलेख दो वर्ष पहले ब्लागर पर आया, पर हिन्दी की स्थिति हर जगह जस की तस है । समय से पहले ही हॄष्ठ पुष्ट करने के उत्साह में, हमने  इसे और भी बीमार बना दिया  है । इसे राजकीय प्रश्रय के आई.सी.यू. की ज़रूरत बनी ही रहती है ।  क्या यह शर्मनाक नहीं है, कि एक अरब से अधिक आबादी वाला मुल्क अपनी  सम्पर्क भाषा का अभाव, आज भी विदेशी भाषा से पूरा कर रहा है ? यदि सामान्य बोलचाल की हिन्दुस्तानी को सम्पर्क भाषा ( Lingua franca ) बने रहने दिया जाता, तो आज यह स्थिति न होती ।
हाँ एक मज़ेदार बात और, सत्ता के जोड़-तोड़ की गुप्त वार्तायें अवश्य ही किसी कूटभाषा में होती  होगी , मसलन मायावती को केवल हिन्दी आती है, फिर भी वह जयललिता से सँवाद स्थापित कर लेती हैं, जो केवल अँग्रेज़ी और तमिल ही जानती हैं । चन्द्रबाबू नायडू ज्योति वसु से बतिया लेते हैं !
अनामदास का यह आलेख अपने आप में इतना विश्लेष्णात्मक और सशक्त है कि, इसमें सँकलनकार की इससे इतर कोई टिप्पणी या इपिलाग ( Epilogue ) बेमानी ही ठहरेगी । बस आवश्यकता एक बार फिर ईमानदारी से विचार किये जाने की है ।
- डा. अमर कुमार

इस पोस्ट पर आयी हुई कुछ टिप्पणियाँ भी बाँचिये ।

विमल वर्मा : अनामदासजी आपने बडे सरल तरीके से अपनी बात कही है. मुझे लग रहा था कि इस मुद्दे पर टिप्पणियां ज़्यादा आएंगी पर इतनी कम टिप्पणी देख कर आश्चर्य हुआ. क्योकि किसी भी लेख को पढ़ने के बाद, टिप्पणी पढ़ना अनिवार्य हो जाना स्वाभाविक है..पर इतने तथ्यपरक लेख को पढने के बाद यही कह सकता हूं कि सटीक लिखा आपने,पर कम टिप्पणियों को देख कर लगा कि इस चिट्ठाजगत में बहुत लोग हैं जो हिन्दी हिन्दी करते रहते हैं, पर अन्दर से अभी उदासीनती की भारी चादर तान के सो रहे है... मंगलवार, अगस्त 07, 2007

इष्टदेव साँकृत्यायन : शिक़ायत को परिवाद लिखे जाने का कारण है. सोचिए, अगर शिक़ायत लिख दिया जाएगा तो लोग समझ नहीं जाएँगे और जब समझ जाएंगे तो करने भी लगेंगे. लोग शिक़ायत करने लगेंगे तो उनका समाधान भी करना पड़ेगा. फिर पूरी व्यवस्था सुधारनी पडेगी. व्यवस्था सुधरेगी तो राजनेताओं और उनकी काली कमाई का क्या होगा? इसीलिए शिक़ायत की जगह परिवाद, काबिलियत की जगह अर्हता लादी जाती है. एक बात और, जिस कचहरी वाली भाषा की बात आप कर रहे हैं, वह भी एक जमाने में लादी ही गयी है. इस संदर्भ में चंद्रभूषण की टिप्पणी बिल्कुल सही है. अगस्त 07, 2007

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30 August 2009

क्यों नाराज़ है, यह शायर ?

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आइये फ़र्ज़ करें कि, अडवानी  प्रधानमन्त्री  बन  ही  जाते । तो, इस दौर के एक विवादित राजनीतिज्ञ निश्चय ही कबिनेट को सुशोभित कर रहे होते । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला तीन साल तो निकाल ही लेते । फिर उनकी किताब आती या न आती, कौन जानता है ? यह न हुआ, और किताब आ भी गयी और अपुन का इन्डिया में भूचाल आ गया । वह पार्टी बदर किये गये, मानों  इस  दौर  में  ज़िन्ना  पर कुछ  लिख  देने  वाला  वतन  का  गुनाहगार  हो  जाता  है ।
किन्तु यह सुविधाजनक कूटनीति है, यह लिप्सा की राजनीति है ।

क्या कभी किसी ने यह सवाल उठाया है कि, बिना किसी लालच के " सारे ज़हाँ से अच्छा यह हिन्दुस्ताँ हमारा .." लिखने वाले शायर अल्लामा इक़बाल ग़ैर हिन्दुस्तानी सरहदों की ज़ानिब क्यों कूच कर गये ? यह ख़ामोशी भी तो एक सुविधाजनक कूटनीति है, नहीं ?
बावज़ूद इन हादसों के, मौज़ूदा  दौर  का  यह  हिन्दुस्तानी  शायर  तमाम  तरह  की  ज़्यादतियों  की  वज़ह से आज़िज़ आकर अपनी  ही  कौम  से  नाराज़  रहा  करता  है । आख़िर मीडिया का माइक इसकी तरफ़ रुख़ करने से क्यों कतराता रहा है ? डर है कि, सरकारी ख़ज़ाने से इश्तिहारों के लिये निकलने वाला पैसा, शायद उससे मुँह न मोड़ ले ? यह भी लिप्सा की एक नीति ही तो है, नहीं ?
इन सबको नकारता हुआ, यह  शायर  ग़ुमनाम  सा  क्यों ? पिछले अक्टूबर और नवम्बर के धमाकों के बाद इसके नज़्मों को नवभारत टाइम्स ने पेश किया, और  फिर  एक  ख़ामोशी  छा गयी । ब्लागर पर सरपँच जी इसको सामने लाये । उस दौर में पूरे मुल्क में जैसे एक सैलाब आया था, उसके  ज़्वार में यह तिनका फिर किनारों पर फेंक दिया गया । मैं तवारीख़ की नज़ीरें पेश करना नहीं चाहता, यह पन्ना उसके लिये नहीं है । और मैं किसी की सरपरस्ती भी नहीं कर रहा, पर  क्या  हमें  अपनी  सोच  की पोस्टमार्टम  करने  की  ज़रूरत  तो  नहीं  है ?   वरना लोग हमसे यूँ ही छिटकते जायेंगे ! 
ताकि सनद रहे  - डा. अमर कुमार
पाकिस्तान के लोगों में पाकिस्तान की हकूमत और पाकिस्तानी मीडिया के ज़रिए ये बात फैलाई जाती है कि हिन्दुस्तान में जो मुसलमान हैं उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है...उनपर ग़मों के पहाड़ ढाए जाते हैं...इस बात को मद्देनज़र रखते हुए एक हिन्दुस्तानी शायर ने पाकिस्तान की मीडिया, पाकिस्तान की हुकूमत और पाकिस्तान की आवाम को मुखातिब करते हुए ये नज़्म कही... जो  आपकी पेश-ए-खिदमत है !
तुमने कश्मीर के जलते हुए घर देखे हैं pak_attrocities
नैज़ा-ए-हिंद पे लटके हुए सर देखे हैं
अपने घर का तु्म्हें माहौल दिखाई न दिया
अपने कूचों का तुम्हें शोर सुनाई न दिया
अपनी बस्ती की तबाही नहीं देखी तुमने
उन फिज़ाओं की सियाही नहीं देखी तुमने
मस्जिदों में भी जहां क़त्ल किए जाते हैं
भाइयों के भी जहां खून पिए जाते हैं
लूट लेता है जहां भाई बहन की इस्मत
और पामाल जहां होती है मां की अज़मत
एक मुद्दत से मुहाजिर का लहू बहता है
अब भी सड़कों पे मुसाफिर का लहू बहता है
कौन कहता है मुसलमानों के ग़मख़्वार हो तुम
दुश्मन-ए-अम्न हो इस्लाम के ग़द्दार दो तुम
तुमको कश्मीर के मज़लूमों से हमदर्दी नहीं
किसी बेवा किसी मासूम से हमदर्दी नहीं
तुममें हमदर्दी का जज़्बा जो ज़रा भी होता
तो करांची में कोई जिस्म न ज़ख्मी होता
लाश के ढ़ेर पे बुनियाद-ए-हुकूमत न रखो
अब भी वक्त है नापाक इरादों से बचो
मशवरा ये है के पहले वहीं इमदाद करो
और करांची के गली कूचों को आबाद करो
जब वहां प्यार के सूरज का उजाला हो जाए
और हर शख्स तुम्हें चाहने वाला हो जाए
फिर तुम्हें हक़ है किसी पर भी इनायत करना
फिर तुम्हें हक़ है किसी से भी मुहब्बत करना
अपनी धरती पे अगर ज़ुल्मों सितम कम न किया
तुमने घरती पे जो हम सबको पुरनम न किया
चैन से तुम तो कभी भी नहीं सो पाओगे
अपनी भड़काई हुई आग में जल जाओगे
वक्त एक रोज़ तुम्हारा भी सुकूं लूटेगा
सर पे तुम लोगों के भी क़हर-ए-खुदा टूटेगा..

जय हिन्द
- मसरूर अहमद
(मसरूर कलम के धनी हैं...ग़लत बात न सुनते हैं , न कहते हैं...शायद इसीलिए अल्लाताला ने उन्हें ये नेमत बख़्शी है...कहा है कि -जाओ धरती पर ...समंदर की सियाही लो...और धरती को काग़ज़ मानो--और लिखते जाओ...सो शरूआत की है उन्होंने । अल्ला उन्हें लंबी उम्र और उंगलियों में ताकत दे)
पोस्ट आभार : सरपँच, 1 दिसम्बर 2008  असल में ये कोना एक पंचायत है, जहां पंच हैं... लोगों की भीड़ है... और कई सवाल हैं जिनके जवाब हैं, मसले हैं जिन पर फैसलों की पूरी गुंजाइश हैं... यानी कोई खाली हाथ नहीं जाएगा... इस कोने का नाम सरपंच इसलिए है क्योंकि यहां आने वाला हर कोई कम से कम अपना सरपंच तो है ही... यानी जो बोले सो निहाल और जो खोले सो सरपंच
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28 August 2009

पुनर्जन्म चक्र पर एक चिंतन : गांधीजी के परिप्रेक्ष्य में

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                                                                                                         अतिथि पोस्ट           
विज्ञान का कोई भी छात्र अमूमन पुनर्जन्म जैसे विषय को एक गप्प मान नकार देगा। लेकिन मैं कहीं -न कहीं पुनर्जन्म को पूर्णतः नकारने को तैयार नहीं हो पाता। इसका कारण भी विज्ञान ही है। मैं भूगर्भ-विज्ञान का छात्र हूँ। प्रकृति को वैज्ञानिक ही नहीं आध्यात्मिक नजरिये से भी देख पाता हूँ। मैग्मा से आग्नेय (Igneous) चट्टानें बनते और इनके विभिन्न रूपान्तरणों द्वारा पुनः मैग्मा में परिवर्तित होते और इस चक्र के सतत् चलते रहने को देखता हूँ। जल चक्र, सौर चक्र आदि कई प्राकृतिक साक्ष्य हैं जो स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति में कहीं विराम नहीं. सतत् गति ही प्रकृति का अमिट सत्य है। तो भला मृत्यु जैसे मात्र एक पड़ाव पर आकर मानवजीवन कैसे रुक सकता है !

प्रकृति के चक्रों के समान ही मैं भी मानता हूँ कि मानव जीवन का चक्र भी चलता रहता है। जिस प्रकार प्रकृति में भी सतत evolution का क्रम जारी रहता है, मनुष्य भी पूर्व जन्म में छुटी अपनी अधूरी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अतिरिक्त तैयारी या evolution के साथ नया जन्म लेता है. क्या हमारे दशावतारों में evolution का यह क्रम नहीं दिखता !
इसी प्रकार यदि इतिहास में झांकें तो क्या फांसी पर चढ़ते मंगल पांडे के दिमाग में यह बात नहीं आई होगी कि हमारे देश की भीरु जनता और स्वार्थग्रस्त शासकों के साथ सशस्त्र क्रांति की सफलता संभव नहीं। तो क्या यही evolution गांधीजी द्वारा किन्ही नए हथियारों के साथ उसी आम जनता में आत्मविश्वास जगा नए सिरे से प्रयास करने में नहीं दिखती !
उनकी मृत्यु  के  समय  तक  रावण  के  परिवार  की  तरह  सर्वत्र  व्याप्त  हो  चुकी विभाजनकारी शक्तियों को देख बापू को भी यह आभास हो गया होगा कि एक अकेला गाँधी इन आसुरी शक्तियों से नहीं निपट सकता। नतीजा आज देश कई छोटे-छोटे गांधियों से भरा पड़ा है, जो अनजान - गुमनाम सी जिंदगी जीते हुए भी सीमित स्तर पर ही सही क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहे हैं। लो, एक गाँधी को तो मार दिया, मगर अब और कितने गांधियों को मारोगे ! सुन्दर लाल बहुगुणा, बाबा आम्टे, राजेंद्र सिंह, और कई अनगिनत,अल्पज्ञात आत्माएं गांधीजी के उसी विशाल प्रकाश पुंज की विभक्त ज्योतियाँ हैं; जिनसे सारा देश प्रकाशित है। आज यदि हमारा देश कायम है और निरंतर आगे बढ़ रहा है तो इसका श्रेय पक्ष-प्रतिपक्ष के राजनीतिक नेतृत्व को नहीं बल्कि इन्ही दीपों को है,जो स्वयं प्रज्जवलित हो आने वाली पीढी को नई राह दिखा रहे हैं। और यही राज है, इन पंक्तियों का कि-
"कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी;
सदियों रहा है दुश्मन(सिर्फ बाहरी ही नहीं), दौरे जहाँ हमारा।"
आज जरुरत गाँधी या भगत सिंह के पुनर्जन्म (पड़ोसी के घर में) की प्रतीक्षा करने की नहीं,बल्कि अपने आस-पास की ऐसी विभूतियों को पहचान उनके कार्यों में यथासंभव योगदान कर उनका उत्साह बढ़ाने की है।
तस्वीर : साभार गूगल
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जो कभी हुआ करता, अपना इन्डिया

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यद्यपि इन सँकलित चित्रों का ब्लागपोस्ट से कोई सरोकार नहीं है, फिर भी इन्हें एक स्थान पर सँजो रखने की गरज़ से बटोरा है । यदि हमारी अपनी पीढ़ी को यह चित्र विचित्र किन्तु सत्य लग सकते हैं, तो आने वाले कई दशकों के बाद इन्हें देखना रोमाचँक कम लोमहर्षक अधिक होगा । क्या पता, अपने विनाश का ताना बाना बुन रही हमारी सभ्यता इन चित्रों को साबूत रहने भी देगी ? तब इन्हें देख  एक सिहरन होगी.. क्या हम ऎसे थे ?
( अधिकाँश चित्र लँदन म्यूजियम के वेबसाइट और  जिन अन्य सूत्रों से सँकलित हैं, उन सबका आभार )

vaishnav                                                 वैष्णवजन तो तेने कहिये

Viceroy House n Parliament                    वायसराय हाउस ( अब राष्ट्रपति भवन ) और पार्लियामेन्ट बना ही था

GT ROAD                        तब शेरशाह सूरी मार्ग ( अब का जी०टी० रोड ) पक्का न हुआ था

Nauch Girls Sonagachhi          लेकिन तब की राजधानी कलकत्ता में सोनागाछी की नाच कन्यायें आबाद हो चुकी थीं

Jama Maszid Delhi 1908 अपनी दिल्ली भी तो तब ज़ामा मस्ज़िद के आसपास ही सिमटी हुई थी, नई दिल्ली बसना शुरु हुई थी

A Princess posing over her Hiunt                   राजे रजवाड़े निरीह जन्तुओं के आखेट के अपने शौर्य को ही सहेजे फिरते थे

a gathering of women in a party Bombay 1910   अँग्रेज़ बहादुर की कृपा से बने नवधनाढ्यों  और अभिजात वर्ग का एकमात्र श्रम आमोद प्रमोद ही था

Desi Slaves Serving a Firangi Master                यह और बात थी कि, तब हम ग़ुलाम थे , जैसे दासता ही हमारी नियति थी

Imperial Airways 'Hanno' Planes carried official Mails , Its refuelling at Shrjah 1913 तक तो हमारे शासन और शोषण की बागडोर सुदूर लन्दन से हवाई डाक द्वारा चलाई जाने लगी

 

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25 August 2009

एक और रात - गुलजार

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सदाबहार ग़ुलज़ार का 75 वाँ जन्मदिन 18 अगस्त को चुपचाप आकर निकल भी गया । कोई शोर नहीं, कोई हलचल नहीं !  मैं उनके लिये कुछ लिखना चाहता था, लेकिन हज़ार चेहरों वाले ग़ुलज़ार के लिये लिखने का मेरा क़द नहीं, बल्कि ईमानदारी से कहूँ कि ड्राफ़्ट को लगभग पाँच दफ़े सुधारने के बाद भी लगता रहा कि “ समपूरन सिंह ग़ुलज़ार “ के लिये मेरी शब्दानुभूति बहुत बौनी है । वह तो विशाल हैं

gz75Gulzar is 75समय के साथ ढलते हुये “ मोरा गोरा रँग लईले “ से लेकर आज की “ जय हो “  की गूँज यूँ ही नहीं है !

ब्लागर पर अनुराग वत्स के लिये श्री रवीन्द्र व्यास ने सबद पर ग़ुलज़ार की बड़ी समयानुकूल रचना दी है । सहेज रखने का मोह न त्याग सका, आप सबसे साझी है । – अमर

एक और रात

gulzchat1चुपचाप दबे पांव चली जाती है
रात खामोश है, रोती नहीं, हंसती भी नहीं
कांच का नीला-सा गुंबद है, उड़ा जाता है
खाली खाली कोई बजरा-सा बहा जाता है
चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन भी नहीं
चांद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल उड़ी जाती है
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता
****

ये देखो तो क्या होता है

गुलजार की जमीन और आसमान सरगोशियों से मिलकर बने हैं । ये सरगोशियां खामोशियों की रातें बुनती हैं । इन रातों में कई चांद डूबते-उतरते रहते हैं । कई टंगे रहते हैं, अपने अकेलेपन में जिनकी पेशानी पर कभी-कभी धुआं उठता रहता है । दूज का चांद, चौदहवीं का चांद और कभी एक सौ सोला रातों का चांद। कभी ये चांद किसी चिकनी डली की तरह घुलता रहता है । ये चांद ख्वाब बुनते रहते हैं । ख्वाबों में रिश्ते फूलों की तरह खिलते रहते हैं और उसकी खुशबू पलकों के नीचे महकती रहती है । ये रिश्ते कभी मुरझा कर ओस की बूंदों की तरह खामोश रातों में झरते रहते हैं ।

वे किसी गर्भवती स्त्री की तरह गुनगुनी धूप में यादों को गुनगुनाते महीन शब्दों से मन का स्वेटर बुनते हैं। इसमें उनकी खास रंगतें कभी उजली धूप की तरह चमकती रहती है। कभी इसमें सन्नाटों की धूल उड़ती रहती है। इसकी बनावट और बुनावट की धीमी आंच में रिश्तों के रेशे अपने दिलकश अंदाज में आपके मन को आपकी देह को रूहानी अहसास कराते हैं।

कहते हैं किसी की आत्मा पेड़ों में बसती है। किसी आत्मा एक फूल में बसती है। कहते यह भी हैं कि आत्मा एक पिंड में बसती है। और यह भी कि आत्मा एक स्वर्ग में बसती है, एक मुहूर्त में बसती है। क्या कहा जा सकता है कि गुलजार की गीतात्मा चांद में बसती है। और चांद यानी रात भी। और रात यानी तारे भी। और तारे यानी समूची कायनात। और इसके बीच वह भी जिससे हिज्र की रात में कहा जा रहा है कि काश इक बार कभी नींद में उठकर तुम भी ये देखो तो क्या होता है...

यह एक और रात है...

इस नज्म की पहली लाइन में रात के बहाने अपनी स्थिति बताने का एकदम सादगीभरा जलवा है । कोई बनाव नहीं । कोई श्रृगांर नहीं ।  लुभाने-रिझाने का कोई अंदाज नहीं । अकेलेपन में रात का चुपचाप, एकदम खामोश गुजरनाभर है । यह एक इमेज है । कहने दीजिए गुलजार इमेजेस के ही कवि हैं । दूसरी लाइन में कोई आहट नहीं, कोई गूंज नहीं ।  न रोना, न हंसना । एक अनकहे को पकड़ने की कोशिश । एक जरूरी दूरी पर खड़े होकर । न  डूबकर, न उतरकर । अपने को भरसक थिर रखते हुए । तीसरी लाइन में रात के जादू को आकार में पकड़ने का वही दिलकश अंदाज है । इसमें चार चीजें हैं-कांच है, नीला है, गुंबद है और वह उड़ा जाता है । कांच, जाहिर है यह रात को उसकी नाजुकता में देखने की निगाह है । रात नीला गुंबद है । अहा। क्या बात है ।  इसमें  एक कोई देखी मुगलकालीन भव्य इमारत की झीनी सी याद है ।

यह रात को कल्पना से तराशने का सधा काम है । रात  को  एक  आकार  देना । उसे देहधारी बनाना । और यह गुंबद है, जो उड़ा जाता है । यानी एक एक मोहक और मारक गति है । एक उड़ती हुई गति । जाहिर है इस गति में रात की लय शामिल है । बीतती लयात्मक रात ।  यह मोहब्बत का स्पर्श है जो गुंबद के भारीपन को किसी चिड़िया की मानिंद एक उड़ान देता है । विश्व विख्यात मूर्तिकार हेनरी मूर को याद करिए। वे पत्थर में चिड़िया को ऐसे ढालते हैं कि पत्थर अपने भारीपन से मुक्त होकर चिड़िया के रूप में उड़ने-उड़ने को होता है । यह फनकार की ताकत है, अपने मीडियम से मोहब्बत है ।

पांचवी  लाइन  बताती  है  कि  यह  शायर  रातों  की  जागता  है  और  रोज  ही  रातों  को  निहारता है ।  इसी जागने  से यह  एक और रात बनी है जिसमें कहा जा रहा है कि चांद की किरनों में वो रोज-सा रेशन नहीं । यह आपकी इंद्रियों का जागना भी है । कलाकार यही करता है । वह सभी इंद्रियों के प्रति आपको सचेत करता है । यह देखना-दिखाना भर नहीं है । छठी पंक्ति में चिकनी डली है । स्पर्श का अहसास है । फिर घुलना है। यह एक और रात कि घुली जा रही है। कि पर गौर फरमाएं। है न कुछ बात । और सातवीं लाइन में इन सबसे घुल-मिल कर एक सन्नाटा रात की तरह ही फैलता जा रहा है । वे इसे उड़ती धूल में पकड़ते हैं। महीन धूल। आठवीं और नौवीं लाइन मारू है। यह रात का जो जादू है, उसकी सुंदरता का जो भव्य स्थापत्य है, अकेलापन है, सन्नाटा है और खामोश गुजरना भर है, इसमें एक ख्वाहिश भी है कि कोई हिज्र की रातों में नींद से उठकर इसे देखे । यह भी कि- ये देखो तो क्या होता है ।  सबद से : प्रकाशित 10 सितम्बर 2008    ( सखा पाठ २ : गुलजार  बजरिए  रवींद्र व्यास  Posted  by  anurag  vats )

इससे आगे

23 August 2009

ब्लागपोस्ट की पहेली ?

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पिछले हफ़्ते, मैंने ( अपनी समझ के अनुसार ) एक  अच्छी पोस्ट सहेजी,  और लिंक व लेखक का नाम न देकर इसे पहेली का रूप दे दिया । यह एक तरह से ख़ुराफ़ात ही कहा जायेगा ।

लोगों ने सोचा होगा, एक  निट्ठल्ला  बैठे  ठाले  ब्लागजगत  में  अपनी  उलटबाँसी  ठोंक  रहा है । बिल्कुल वाज़िब बात, आख़िर  क्या  ज़रूरत  है  ऎसे  ब्लागपोस्टों  को सहेजने की... उस पर भी शीर्षक ? वह भी तब.. जबकि हर कोई यहाँ बिज़ी है, या कम से कम ’बिज़ी’ दिखना चाहता है । ज़ाहिर है, जैसा सोचा था, वह न हुआ । यह बेचारी पोस्ट अपने स्वयँवर के लिये अभी तक प्रतीक्षारत है । कुल ज़मा 6 अभ्यर्थी, उसमें भी एक की तो इससे रिश्तेदारी ही निकल आयी । बेचारे खुद ही शर्मा कर चले गये ।

पहेलियों पर टूट पड़ने वाली जनता भी सनाका मार गयी । शायद कोरल-ड्रा या फोटोशॉप से बनाये गये सम्मानपत्र की प्रत्याशा यहाँ न थी, यह भी एक कारण हो सकता है । पर यह तो साफ हो गया, यह पोस्ट या तो किसी की जानकारी में न रही हो, या  यह  विस्मृति  की  शिकार  हो  गयी  हो । बहुतों ने शायद पढ़ा ही न हो ?  तो.. यह थी निट्ठल्ले की उलटबाँसी ! वह दूसरों के लिखे पुराने पोस्ट याद रखना चाहता है.. और वर्तमान का बेहतरीन भी कहीं और सहेज रहा है ।

निट्ठल्ला यूँ कि, अपनी पोस्टों में मज़ाहिया अँदाज़ और बेतक्कलुफ़ लफ़्ज़ों की दख़लअँदाज़ी के चलते,  सहज ही ब्लागजगत में एक ’ क्लाउन-स्टेटस’ पा लिया । इस हद तक कि एक बार एक अहम मसले पर भेजे गये मेल के ज़वाब में हिन्दी की अलमबदार विद्वान लेखिका ने मुझसे उल्टे  पूछ ही लिया, " आर यू किडिंग ? इट इज़ हार्ड टू बिलीव ।  प्लीज़ रिप्लाई सून, सो दैट आई शैल पुट इट इन माई चिट्ठाचर्चा । " लीजिये ज़नाब, गोया दुनिया में जो भी दिखता है, सब सच ही होता होगा ?

उलटबाँसी इस करके कि, इस बस्ती में सभी अपनी सुनाना चाहते हैं, दूसरों को सुनना कम पसँद करते हैं.. याकि समय नहीं होता गोकि सभी तो ’बिज़ी’ ठहरे ! तक़रीबन हर ब्लागर के मेल इनबाक्स में इस  समय  भी  एक  न  एक  न्यौता  पड़ा  होगा, कभी  हमारे ब्लाग पर भी घूम जाइये.. " चाँद , मैं और श्मशान में रोता एक खजुहा कुत्ता " , ज़रूर  आइयेगा । क्योंकि न्यौते भेजे जाते हैं..तो ऎसे न्यौते पूरे भी किये जाते हैं । इस बिन्दु पर कहीं न कहीं फँसने की सँभावनायें अवश्य दिखतीं होंगी,क्योंकि लोग फँस भी जाते हैं । जाने वाला अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाने को ’नेग-व्यौहार’ स्वरूप वहाँ कुछ शब्द भी टँकित कर आता है, क्योंकि  इससे  व्यवहार  बनता  है । व्यवहार  बनाने  और  बनाये  रखने  वाले व्यवहारकुशल कहलाते हैं । कुल ज़मा प्रश्न यह कि,क्या ब्लागिंग केवल व्यवहारकुशलता पर ही टिकी है ? यहाँ बेहतर.. और बेहतर, बेहतरीन की पुकार किधर गयी ? हिन्दी ब्लागलेखन में केवल कचरा ही भरा पड़ा है, की धिक्कार ही क्यों छायी हुई है ?

यथासँभव कहीं ऎसी स्मृतिलोप के भय की वज़ह से ही तो नहीं , तात्कालिक  रूप  से  लोकप्रिय  होने वाला लेखन  एक चलन बनता जा रहा है ? याकि वक्ताओं के नित जुड़ने वाले इस समूह में, अध्येता अपने अल्पसँख्यक होते जाने से पलायन कर रहे हों ? फुरसतिया जैसे बिरले ही होंगे, जो कि टिके हुये हैं । अभी हाल में ही उन्होंने ब्लागिंग में अपनी उम्रकैद के पाँच वर्ष पूरे होने पर खुशी जतायी है । समीर भाई भी अपने लिखने और दूसरों को पढ़ने  में 1:10 का मानक मानते हैं । हममें से कितने जन इस सूत्र का आदर करते होंगे ? ब्लागलेखन के शैशवास्था में रखे रहने का युग कब तक रहेगा ? याकि यह शैशवास्था ब्लागजगत में एक और कलयुग उपस्थित होने की अन्यन्त्र-स्थिति ( Alibi ) है ?

शीर्षक या लेखक को पहचानने के लिये रखी गयी, यह  सँदर्भित  पोस्ट  तो  हिन्दी  ब्लागिंग  के  प्रारँभिक दिनों की है, फिर ?  अभी अभी फुरसतिया का जिक्र हुआ है, तो चलिये ऎसी धीर-गँभीर सारगर्भित पोस्ट लिखने का ठीकरा उन्हीं के सिर पर फोड़ते हैं ।
आयोजन : अनुगूँज
प्रकाशित : 14 नवम्बर 2004
प्रकाशन स्थल : http://fursatiya.blogspot.com
पोस्ट शीर्षक : भारतीय सँस्कृति क्या है
लेखक : श्री अनूप शुक्ल

और हाँ, सदा की भाँति पोस्ट के अँत में उन्होंने अपनी पसँद भी दी है, वह रही जा रही थी ।
मेरी पसंद
आधे रोते हैं ,आधे हंसते हैं
दोनों अवन्ती में बसते हैं
कृपा है ,महाकाल की
आधे मानते हैं,आधा
होना उतना ही
सार्थक है,जितना पूरा होना,
आधों का दावा है,उतना ही
निरर्थक है पूरा
होना,जितना आधा होना
आधे निरुत्तर हैं,आधे बहसते हैं
दोनों अवन्ती में बसते हैं
कृपा है ,महाकाल की
आधे कहते हैं अवन्ती
उसी तरह आधी है
जिस तरह काशी,
आधे का कहना है
दोनों में रहते हैं
केवल प्रवासी
दोनों तर्कजाल में फंसते हैं
दोनों अवन्ती में बसते हैं
हंसते हैं
काशी के पण्डित अवन्ती के ज्ञान पर
अवन्ती के लोग काशी के अनुमान पर
कृपा है ,महाकाल की.

--श्रीकान्त वर्मा

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15 August 2009

भारतीय सँस्कृति और इससे जुड़ी एक पहेली

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जबसे इस ब्लाग की परिकल्पना बनी, तभी से एक पोस्ट मन में बार बार घुमड़ रहा था ।  शायद        अक्टूबर 2007 के आस पास पढ़े  गये  इस पोस्ट का कन्टेन्ट तो मोटा मोटी  याद था, शीर्षक याद आये तो  लिंक  टटोलूँ ! मेरे  कम्प्यूटरों  में  कितने  हार्ड  डिस्क  आये  और  चले  भी गये । लिंक क्या रक्खा रहता ? उसका न मिलना जैसे एक अपरिहार्य आवश्यकता बन गया । सहसा याद आया, कि उन दिनों ही नया नया राइटर लिया था..तो कच्चा पक्का जो भी मिलता, उनको तुरत-फुरत जला कर अपने सीडी सँग्रह का भरण पोषण किया करता । अब एक नई मुसीबत.. कि सीडी कहाँ ज़मींदोज़ है, इसकि ढ़ूढ़ में रोज पँडिताइन से एक चोट बकचुप होती रही ( वह यदि बकती हैं, मैं बरबस चुप ही रहता हूँ.. हो गया न एक बकचुप का अविष्कार ! ) मेरे  सिड़ी विभूषित होते ही सीडी जी भी प्रकटे । लिंक मिला, पोस्ट है

भारतीय संस्कृति क्या है लिंक इसी ब्लागपृष्ठ पर कहीं टहल रहा है, वह आप तलाशियेगा   । अभी तो आप यह पोस्ट पढ़िये :

जबसे पंकज ने पूंछा-भारतीय संस्कृति क्या है तबसे हम जुट गये पढने में.सभ्यता,संस्कृति क्या है .भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बारे में जितना इन दो दिनों में हम पढ गये उतना अगर हम समय पर पढ लिये होते तो शायद आज किसी वातानुकूलित मठ में बैठे अपना लोक और भक्तों का परलोक सुधार रहे होते.पर क्या करें जब भक्तों का परलोक सुधरना नहीं बदा है उनके भाग्य में तो हम क्या कर सकते हैं?

संस्कृति की बात करें तो सभ्यता का भी जिक्र आ ही जाता है.सभ्यता और संस्कृति की परस्पर क्रिया -प्रतिक्रिया होती है और दोनो एक-दूसरे को प्रभावित भी करती हैं. यह माना जाता है कि सभ्यता बाहरी उपलब्धि है और संस्कृति आन्तरिक.मनुष्य ने अपने सुख-साधन के लिये जो निर्मित किया वह सभ्यता है.इसमें मकान से लेकर महल और बैलगाङी से लेकर हवाईजहाज हैं.सुख की सामग्री है.

परंतु मनुष्य केवल बाहरी सुख-साधनों से संतुष्ट नहीं होता.वह मंगलमय जीवन मूल्यों को ग्रहण करना चाहता है.दया,प्रेम,सहानुभूति तथा दूसरे की मंगलकामना है.यह उदात्त है .इसमें सौन्दर्य की चाह है.यह संस्कृति है. नेहरूजी ने  लिखा  है - संस्कृति की कोई निश्चित परिभाषा नहीं दी जा सकती. संस्कृति के लक्षण देखे जा सकते हैं.हर जाति अपनी संस्कृति को विशिष्ट मानती है.संस्कृति एक अनवरत मूल्यधारा है.यह जातियों के आत्मबोध से शुरु होती है और इस मुख्यधारा में संस्कृति की दूसरी धारायें मिलती जाती हैं.उनका समन्वय होता जाता है.इसलिये किसी जाति या देश की संस्कृति उसी मूल रूप में नहीं रहती बल्कि समन्वय से वह और अधिक संपन्न और व्यापक हो जाती है. भारतीय संस्कृति के बारे में जब बात होती है तो उसकी प्रस्तावना काफी कुछ इस श्लोक में मिलती है:-

सर्वे भवन्ति सुखिन:,सर्वे सन्तु निरामया,
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,मा कश्चिद् दुखभाग् भवेत्.

सब सुखी हों,सभी निरोग हों,किसी को कोई कष्ट न हो.यह लोककल्याण की भावना भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व है.पर देखा जाये तो सभी संस्कृतियां किसी न किसी रूप में लोककल्याण की बात करती हैं.फिर ऐसी क्या विशेष बात है भारतीय संस्कृति में?नेहरूजी अनुसार -समन्वय की भीतरी उत्सुकता भारतीय संस्कृति की खास विशेषता रही है.

आर्य  जब  भारत  आये  तो  वे  विजेता  थे.तब  यहां  द्रविङ ( उन्नत सभ्यता ) और  आदिवासी  ( आदिम अवस्था )  थे . समय  लगा  पर  आर्यों-द्रविङों  में  समन्वय  हुआ  .दोनों ने एक दूसरे के देवताओं और अनेक दूसरे तत्वों को अपना लिया.समन्वय की यह परंपरा तब से लगातार कायम है.तब से अनेक जातियां भारत आईं.कुछ हमला करने और लूटने और कुछ यहीं बस जाने.कुछ व्यापार के बहाने आये तो कुछ ज्ञान की खोज में. ग्रीक, शक, हूण, तुर्क, मुसलमान,अंग्रेज आदि -इत्यादि आये.रहे.कुछ लिया,कुछ दिया.कुछ सीखा कुछ सिखाया.जो आये वे यहीं रह गये.किसी जाति में समा गये.

जिस समय मारकाट चरम पर था उसी समय सूफी-संत प्रेम की अलख जगा रहे थे.धार्मिक कट्टरता को मेलजोल, भाईचारे,मानवतावाद , सदाचरण में बदलने की कोशिश की.अमीर खुसरो ने फारसी के साथ भारतीय लोक भाषा में लिखा:-

खुसरो रैन सुहाग की जागी पी के संग,
तन मेरो मन पीउ को दोऊ भये एक रंग.

यह समन्वय की प्रवत्ति ही भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है.यह वास्तव में लोक संस्कृति है.वह लोक में पैदा होती है और लोक में व्याप्त होती है.यह सामान्य जन की संस्कृति होती है-मुट्ठी भर अभिजात वर्ग की दिखावट नहीं.

जब संस्कृतियों की बात चलती है तो उनके लक्षणों की तुलना होती है.कहते हैं भारतीय संस्कृति त्याग की संस्कृति है जबकि पश्चिमी संस्कृति भोग की संस्कृति है.लोककल्याण की भावना हमारी विशेषता है, आत्मकल्याण की भावना उनकी आदत.यह सरलीकरण करके हम अपनी संस्कृति के और अपने को महान साबित कर लेते हैं. स्वतंत्रता,समानता और खुलापन पश्चिमी संस्कृति के मूल तत्व है.हमारे लिये ये तत्व भले नये न हों पर जिस मात्रा में वहां खुलापन है वह हमें चकाचौंध और नये लोगों को शर्मिन्दगी का अहसास कराता है-क्या घटिया हरकतें करते हैं ये ससुरे.फिर कालान्तर में वही घटिया हरकतें पता नही कैसे हमारी जीवन पद्धति बन जाती है ,पता नहीं चलता.इस आत्मसात होने में कुछ तत्वों का रूप परिवर्तन होता है.यही समन्वय है

तो देखा जाये तो हर संस्कृति में समन्वय की भावना रहती है. अमेरिका की तो सारी संस्कृति समन्वय की है.पर मूल तत्व की बात करें तो यह दूसरों के प्रति असहिष्णुता की संस्कृति है.अमेरिका में जब अंग्रेज  आये  तो  यहां  के  मूल  निवासियों ( रेड इंडियन ) को  मारा, बरबाद कर दिया. रेड इंडियन उतने सक्षम ,उन्नत नहीं थे कि मुकाबला कर पाते ( जैसा भारत में द्रविङों ने आर्यों का किया होगा ). मिट गये.यह दूसरों के प्रति सहिष्णुता का भाव अमेरिकी संस्कृति का मूल भाव हो गया. जो हमारे साथ नहीं है वह दुश्मनों के साथ है  यह   अपने विरोध  सहन  न  कर पाने की  कमजोरी  है .यह  डरे  की  संस्कृति है .जो  डरता  है  वही  डराता  है.

यह छुई-मुई संस्कृति है.हजारों परमाणु बम रखे होने बाद भी जो देश किसी दूसरे के यहां रखे बारूद से होने के डर से हमला करके उसे बरबाद कर दे.उससे अधिक छुई-मुई संस्कृति और क्या हो सकती है?

भोग की प्रवत्ति के बारे में तो लोग कहते हैं भोग की बातें वही करेंगे जिनका पेट भरा हो.जो सभ्यतायें उन्नत हैं .रोटी-पानी की चिन्ता से मुक्त है जो समाज वो भोग की तरफ रुख करेगा.रोमन सभ्यता जब चरम पर थी तो वहां लोग गुलामों ( ग्लेडियेटर्स ) को तब तक लङाते थे जब तक दो गुलामों में से एक की मौत नहीं हो जाती थी. रोमन  महिलायें  नंगे  गुलामों  को  लङते  मरते  देखती  थीं. इससे यौन तुष्टि ,आनन्द प्राप्त करती थीं.सभ्यता के चरम पर यह रोम की संस्कृति के पतनशील तत्व थे.बाद में उन्हीं गुलामों ने रोम साम्राज्य के खिलाफ विद्रोह किया.

खुलेपन के नाम पर नंगापन बढने की प्रवत्ति के बारे में रसेल महोदय ने कहा है:-जब कोई देश सभ्यता के शिखर पर पहुंच जाता है तब उस देश की स्त्रियों की काम- लिप्सा  में  वृद्धि  होती  है  और इसके साथ ही राष्ट्र का अध:पतन प्रारम्भ हो जाता है .इस समय  अमेरिकन  स्त्रियों  में  यह  काम-लोलुपता  अधिक दृष्टिगोचर  होती है और 35 से 40 वर्ष की अवस्था की अमेरिकन स्त्री वेश्या का जीवन ग्रहण करना चाहती है ,जिससे उसकी कामपिपासा शान्त हो सके.

हम खुश हो के सारे विकसित देशों के लिये कह सकते हैं- इसकी तो गई.पर हम अपने यहां देखें क्या हो रहा है.हम पुराने आदर्शों को नये चश्में से देख रहे है.तुलसीदास ने उत्तम नारी के गुण बताये हैं:-
उत्तम कर अस बस मन माहीं,
सपनेंहु आन पुरुष जग नाहीं .
उत्तम नारी सपने में भी पराये पुरुष के बारे में नहीं सोचती. आज की जरूरतें बदली हैं.लिहाजा हमने इस चौपाई का नया अर्थ ले लिया ( उत्तम  नारी  के  लिये  सपने  में  भी  कोई  पुरुष  पराया  नहीं होता ) .पंजाब  में  लोगों ने इस समस्या का और बेहतर उपाय खोजा.महिलाओं की संख्या ही कम कर दी.न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. महिलायें रहेंगी ही नहीं तो व्यभिचार कहां से होगा.  प्रिवेन्शन  इज बेटर दैन क्योर.

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपनी कविता भरत तीर्थ में कहा है-भारत देश महामानवता का पारावार है.यहां आर्य हैं,अनार्य हैं,द्रविङ हैं और चीनी वंश के लोग भी हैं.शक,हूण,पठान और मुगल न जाने कितनी जातियों के लोग इस देश में आये और सब के सब एक ही शरीर में समाकर एक हो गये.
यह समन्वय की प्रवत्ति ही भारतीय संस्कृति का मूल तत्व है.

भारतीय सँस्कृति की यह समन्वयवादी विवेचना बहुत ही स्पष्ट है । इसमें पँडित नेहरू की एक पँक्ति और जोड़ दी जाय, " यह सत्य की अनवरत खोज है ! " हालाँकि यह उन्होंनें  हिन्दुत्व के लिये कहा था ,  और  हमारे साथी हिमाँशु  की  मनपसन्द  लाइनें  हैं , मैं अपनी ओर से  थोड़ा  और  जोड़  दूँ  कि  यह  खोज मानवीय  सत्यों  की अनवरत  खोज में निहित  है  और  आधुनिक  विज्ञान   द्वारा  ईंट  रोड़ा  जोड़  कर  खोजे  जाने वाले  भौतिक सत्यों से निताँत परे है ! तो चलें.. अगले सप्ताह फिर मिलेंगे, एक और बिसरे - बिछड़े आलेख के साथ ! अरे, पहेली तो रह ही गयी ।

सुना कि शनीचरी पहेली हिट होतीं हैं, सो यह बड़ा आसान पड़ेगा आपको ! आपको केवल यह तलाशना है, या बताना है कि यह पोस्ट किसने और कब, क्यूँ लिखी थी ? एक हिन्ट भी दिये दे रहा हूँ, यह सन 2004 के दरमियान की है । और.. आज  के  एक हिट ब्लागर की नॉट-सो हिट पोस्ट की कतार में शुमार की जा सकती है । अब तो खुश ?

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14 August 2009

तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ

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श्री प्रियरँजन जी राँची से हैं, और पेशे से पत्रकार हैं । वह उदयकेशरी जी के ब्लाग सीधी बात ( Dare to say truth ) पर यदा कदा पोस्ट भी देते रहते हैं । जून 2008 में उनकी एक पोस्ट रिंगटोन का बाज़ार और संस्कृति एक साथ कई प्रश्न उठाती है । किंवा किसी पाठक को उनकी बात को आगे बढ़ाने का साहस न हुआ होगा । पर स्थियाँ जस की तस तो क्या हैं, बल्कि बद से बदतर ही होती जा रही हैं, जरा देखिये तो

बरसों पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘अजनबीपन’ - दिल्ली में अकेले रहते हुए रात को टेलीफोन बूथ से अपने घर फोन करने के अनुभव पर । मुझे याद है कि एसटीडी तारों के उलझे हुए दिनों में बड़ी मुश्किल से फोन मिला करते थे, लेकिन जब मिल जाया करते तो अचानक उनकी मशीनी ध्वनि बेहद मानवीय हो जाती । लगता था, जैसे बीप बीप की वह आवाज़ मुझे दिल्ली और रांची के बीच बिछे अनगिनत उलझे तारों के रास्ते 1200 मील दूर अपने घर के ड्राइंग रूम तक ले जाती है ।

आज जब रिंगटोन और कॉलर ट्यून्स की एक रंगारंग दुनिया हमारे सामने है, तब भी मुझे रात ग्यारह बजे के आसपास बजती हुई वह बीप बीप याद आती है, क्योंकि इस ध्वनि से मेरी पहचान थी, वह मेरा धागा थी, जो मुझे दूसरों के साथ बांधती थी । आज वह ध्वनि मुझे नहीं मिलती, क्योंकि जब भी मैं किसी को फोन करता हूं, दूसरी तरफ कोई धुन, किसी फिल्मी गीत की कोई पंक्ति, या कोई बंदिश प्यार, इसरार, मनुहार या शृंगार बिखेरती हुई मेरी प्रतीक्षा की घड़ियों को मादक बना रही होती है ।

दरअसल इन दिनों मोबाइल क्रांति ने ‘रिंगटोन’ और कॉलर ट्यून्स’ के जरिये जो नई सांगीतिक क्रांति की है, उसके कई पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है । आप किसी को फोन करें और आपको कोई अच्छी सी धुन या बंदिश सुनाई पड़े, इसमें कोई बुराई नहीं लगती । यही नहीं, जो लोग फोन पर अपनी पसंदीदा धुनें लगाकर रखते हैं, उनका एक तर्क यह भी हो सकता है कि इससे उनके व्यक्तित्व का भी कुछ पता चलता है ।

लेकिन क्या संगीत का यह उपयोगितावाद क्या एक सीमा के बाद खुद संगीत के साथ अन्याय नहीं करने लगता... संगीत का काम सारी कला-विधाओं की तरह एक ऐसे आनंद की सृष्टि करना है, जिसके सहारे हमें अपने-आप को, अपनी दुनिया को कुछ ज्यादा समझने, कुछ ज्यादा खोजने में मदद मिलती है । लेकिन जब हम संगीत को ‘टाइम पास’ की तरह इस्तेमाल करते हैं तो उसको उसके मूल लक्ष्य से भटकाते हैं । किसी फोन कॉल पर किसी बड़े उस्ताद की पांच सेकंड से लेकर 15 या 30 सेकंड तक चलने वाली बंदिश जब तक आपकी पकड़ में आती है, ठीक उसी वक्त कोई आवाज इस बंदिश का गला घोंट देती है ।

आप शिकायत नहीं कर सकते, क्योंकि आपने संगीत सुनने के लिए नहीं, बात करने के लिए किसी को फोन किया है । संगीत तो बस उस इंतज़ार के लिए बज रहा है, जो आपका फोन उठाए जाने तक आपको करना है । आप इस समय जम्हाई लें या बंदिश सुनें, किसी को फर्क नहीं पड़ता । अलबत्ता बंदिश को ज़रूर फर्क पडता है, क्योंकि पांच बार उसे पांच-दस या 20-30 सेकंड तक आप सुन चुके हैं और उसका जादू जा चुका है । छठी बार वह पूरी बंदिश सुनने भी आप बैठें तो उसका अनूठापन आपके लिए एक व्यतीत अनुभव है, क्योंकि आपको मालूम है कि इसे तो आपने अपने किसी दोस्त के मोबाइल पर सुन रखा है ।

असल में हर फोन सिर्फ गपशप के लिए नहीं किया जाता, बल्कि सिर्फ गपशप जैसी कोई चीज नहीं होती - कोई न कोई सरोकार उस गपशप की प्रेरणा बनता है, कोई न कोई संवाद इसके बीच आता है, सुख या दुख के कुछ अंतराल होते हैं । जाहिर है, संगीत की कोई धुन या बंदिश इस संवाद में बाधा बनती है । आप किसी अफसोस या दुख की कोई खबर साझा करने बैठे हैं और आपको फोन पर कोई भैरवी या ठुमरी या चालू फिल्मी गाना सुनने को मिल रहा है तो आपको पता चले या नहीं, कहीं न कहीं, यह आपके दुख का उपहास भी है । यही बात सुखद खबरों के साथ कही जा सकती है ।

संस्कृति एक बहुत बड़ी चीज है, उसे आप काटकर प्लेटों में परोस नहीं सकते, उसे टुकड़ा-टुकड़ा कर पैक नहीं कर सकते । लेकिन बाजा़र यही करने की कोशिश कर रहा है । वह मोत्सार्ट, बाख, रविशंकर, हरिप्रसाद चौरसिया और उस्ताद बिस्मिल्ला खां का जादू छीनकर उसे अपनी डिबिया में बंद कर रहा है और बेच रहा है । खरीदने वालों को भी संस्कृति का यह इत्र रास आ रहा है, क्योंकि इसके जरिये वह बता पा रहे हैं कि उनका नाता बड़ी और कलात्मक अभिव्यक्तियों से भी है ।

दरअसल हर ध्वनि का अपना मतलब होता है, हर मुद्रा का अपना अर्थ । दरवाजे पर दस्तक देने की जगह कोई गाना गाने लगे तो इसे उसका कला प्रेम नहीं, उसकी सनक मानेंगे । ध्वनियों के सहारे हम हंसी को भी समझते हैं, रुलाई को भी । अगर हवा के बहने और पानी के गिरने की ध्वनियां किन्हीं दूसरे तरीकों से हम तक पहुंचने लगें तो समझिए कि कुदरत में कोई अनहोनी हुई है - या तो कोई भयावह तूफ़ान हमारे रास्ते में है या कोई विराट बाढ़ हमें लीलने को आ रही है । क्या मोबाइल क्रांति ने हमारी ध्वनि-संवेदना नहीं छीन ली है, वरना हम एक आ रहे तूफ़ान को पहचानने में इतने असमर्थ क्यों होते...?

सीधी बात : रिंगटोन का बाज़ार और सँस्कृति / जून 1, 2008 से साभार

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12 August 2009

राष्ट्रकवि और ठेठ हिन्दी के ठाठ

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-हिंदुस्तान 7 मार्च, 1956 पहला पेज दो कालम की खबर है, जिसमें प्रख्यात कवि मैथिलीशरण गुप्त ने कवितामय अंदाज में बजट से जुड़े सवाल पूछे हैं-

–आह कराह न उठने दे जो शल्य वैद्य है वही समर्थ—राष्ट्रकवि की दृष्टि में बजट-

हमारे संवाददाता द्वारा नई दिल्ली 6 मार्च, राज्य सभा में साधारण बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने निम्नलिखित कविता पढ़ी-


धन्यवाद हे धन मंत्री को करें चाय सुख से प्रस्थान,

हम सब पानी ही पी लेंगे, किंतु खान पहले फिर पान

मिटे मद्य कर लोभ आपका अधिक आय का वह अभिशाप ,

दे देकर मद मोह स्वयं ही फिर प्रबोध देते हैं आप।

कर लेते हैं आप , आपके गण लेते हैं धन युत मान,

थाने क्या निज न्यायालय ही जाकर देखें दया निधान।

खोलें एक विभाग आप तो यह धर्षण हो जाये ध्वस्त,

जांच करे अधिकारी वर्ग की गुप्त भाव से वह विश्वस्त।

पहले ही था कठिन डाक से ग्रंथों द्वारा ज्ञान प्रसार,

पंजीकरण शुल्क बढ़ाकर अब रोक न दें विद्या का द्वार।

किन्तु नहीं पोथी की विद्या पर कर गत धन सी अनुदार,

साधु, साधु, श्रुति पंरपरा का आप कर रहे हैं उद्धार।

सुनते थे उन्नत देशों में कुछ जन नंगे रहते हैं,

स्वस्थ तथा स्वाभाविक जीवन वे इसको ही कहते हैं।

नया वस्त्र कर देता है यदि आज वही संकेत हमें,

तो हम कृतज्ञता पूर्वक ही उसे किसी विधि सहते हैं।

मक्खन लीज छाछ छोड़िए देश भक्ति यह सह लेगी,

पारण बिना किन्तु जनता क्या व्रत करके ही रह लेगी।

यह यथार्थ है यत्न आपके हैं हम लोगों के ही अर्थ,

आह कराह न उठने दे, जो शल्य वैद्य है वही समर्थ।

लोगों की चिंता थी जाने जीवन पर भी कर न लगे,

मर कर भी कर जी कर भी कर, डर कर कोई कहां भगे।

एक जन्म कर ही ऐसा है, जिस पर कुछ कुछ प्यार पगे,

और नहीं तो जन संख्या ही संभले, संयम भाव जगे।

कवि की कविता का जवाब भी कविता में मिला है, इसे भी हिंदुस्तान ने अपनी रिपोर्ट में दर्ज किया है।

हिंदुस्तान 9 मार्च, 1956 पहले पेज पर सिंगल कालम खबर

वित्तमंत्री का नया तराना / हमारे विशेष संवाददाता द्वारा


नई दिल्ली-राज्य सभा में साधारण बजट पर हुई बहस का उत्तर देते हुए वित्त मंत्री श्री चिंतामन देशमुख ने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के कवितामय भाषण का कविता में ही जवाब दिया, जो इस प्रकार है-


भारत भू के कायाकल्प का

आज सजा है पावन याग

स्नेह भरे कर लगा कमर को

बांध पटसे ले कवि भाग

सकल निगम और शिशु नर नारी

स्व-स्व पदोचित करके त्याग

चलें जुड़ाकर कर में कर को

दृढ़ता पग में नयनों जाग

यही पारणा यही धारणा

यही साधना कवि मत भाग

नया तराणा गूंज उठावो

नया देश का गावो राग

अँतर्जाल प्रकाशन स्रोत : काकेश की कतरनें पोस्ट July 23rd, 2007 से

अभिलेख पुष्टि/सत्यापन : रँधावा पुस्तकालय, रायबरेली

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9 August 2009

बच्चे.. जो बच्चे न रह पायेंगे

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कुछ दिनों पहले डा० महेश परिमल की एक पोस्ट पढ़ी थी.. उन्होंनें एक विचारोत्तेजक और ज़ायज़ मुद्दा उठाया था । सरकार व जनसाधारण की बात तो दूर.. ब्लागर पर ही उनकी बात दब कर रह गयी । कई दिनों के प्रयास के बाद लिंक मिल पाया है । देखिये तो..
उस दिन टीवी पर प्रसारित होने वाले बच्चों के धारावाहिकों की सूची देख रहा था, तब यह जानकर आश्चर्य हुआ कि आजकल बच्चोें के लिए टीवी पर ऐसा कुछ भी देखने लायक नहीं है, जिससे उनके मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान भी बढ़े. आजकल जो कुछ भी बच्चों के नाम पर टीवी पर परोसा जा रहा है, उससे लगता है कि एक साजिश के तहत बच्चों को 'ग्लोबल इंडियन ' बनाया जा रहा है. यह एक खतरनाक सच्चाई है, जिसे आज के पालक भले ही समझें, पर सच तो यह है कि आगे चलकर यह निश्चित रूप से समाज के लिए एक पीड़ादायी स्थिति का निर्माण होगा, जिसमें बच्चे केवल बच्चे बनकर नहीं रह पाएँगे, बल्कि उनका व्यवहार ऐसा होगा, जिससे लगेगा कि वे समय से पहले ही बड़े हो गए हैं, उनका बचपन तो पहले ही मारा जा चुका है.
अब ंजरा बच्चों के उन धारावाहिक के नाम ही पढ़ लें,जो उन्हें भा रहे हैं. उस दिन एक बच्चे से उन धारावाहिकों के नाम सुने, वह बता रहा था कि उसे तो ड्रेगन फ्राम ओटावा, हाफ टिकट एक्सप्रेस, मिकी माऊस प्ले हाऊस, शीनचिन, गली-गली सिमसिम, मैड (म्युजिक, आर्ट, डांस), कार्टून नेटवर्क की दुनिया आदि धारावाहिक अच्छे लगते हैं. कभी आपको फुरसत मिले, तो इनमें से कोई एक धारावाहिक देखने की जहमत उठा लीजिए. आपको पता चल जाएगा कि विदेशी पृष्टभूमि पर आधारित इन धारावाहिकों के पात्र बोलते तो हिंदी ही हैं, पर कभी-कभी कुछ ऐसा कह जाते हैं, जो उनके क्या पालकों के भी पल्ले नहीं पड़ता. ऐसे में लगता है कि ये सब क्या हो रहा है? क्या यह सब पालकों की मर्जी से हो रहा है या फिर अनजाने में ही सब कुछ हो रहा है और पालकों को पता ही नहीं है.
अधिक समय नहीं हुआ है, अभी दस वर्ष पहले ही बच्चों को सामने रखकर कई धारावाहिकों का प्रसारण विभिन्न चैनलों पर हो रहा था. पोटली बाबा की, अलीफ लैला, सिंदबाद की कहानियाँ, वेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी, विक्रम और वेताल, तेनाली राम, कैप्टन व्योम, मालगुड़ी डेज, कैप्टन हाऊस, दादा-दादी की कहानियाँ, जंगल बुक पर आधारित मोगली का धारावाहिक ये सब ऐसे कार्यक्रम थे, जिनसे बच्चों को न केवल भारतीय संस्कृति से परिचित कराते थे, बल्कि काफी हद तक उसका पोषण भी करते थे. पर अब वह बात नहीं रही. अब तो सारे कार्यक्रमों पर व्यावसायिकता हावी हो गई है. अब तो बच्चों को वह सब कुछ दिखाया जा रहा है, जिससे केवल कंपनियों को ही लाभ हो. बच्चे क्या चाहते हैं, इसे जानने की फुरसत किसी के पास नहीं है. जो बड़े चाहते हैं, बच्चे वही देख रहे हैं.
बच्चों के धारावाहिकों के संबंध में इंडियन चिल्ड्रंस सोसायटी की चेयरमेन नफीसा अली का कहना है कि आजकल बच्चों को धारावाहिकों के रूप में जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह कमोबेश अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के डब संस्करण हैं. यह एक चिंताजनक स्थिति है, क्योंकि इन कार्यक्रमों की सांस्कृतिक भूमिका हमारे देश के बच्चों की सामान्य समझ से मेल नहीं खाती. दूसरी ओर यू टीवी की वाइज प्रेसीडेंट मनीषा सिंह कहती हैं कि हम यदि कोई कार्यक्रम आयात करते हैं,तो उसमें से भारतीय संस्कृति और सामाजिक स्तर पर उचित न लगने वाले भाग को हम काट देते हैं. लेकिन उनका यह दावा कितना उचित है, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी बच्चे इन धारावाहिकों से वह सब कुछ सीख रहे हैं, जिसे उन्हें कुछ वर्ष बाद जानना है. आज बच्चों को बड़ों की बातें धारावाहिकों के माध्यम से बताई जा रही हैं. बच्चे इसे देखकर समय से पहले ही बड़ों की बातें न केवल समझ रहे हैं, बल्कि उसे अमल में भी ला रहे हैं.
अभी तक बच्चों के लिए कोई ऐसा चैनल तैयार नहीं किया गया है, जिससे भारतीय संस्कृति का पोषण होता हो. इस दिशा में पोगो के माध्यम से दिन भर बच्चोें से जुड़ी जानकारियों का प्रसारण होता रहता है, पर उसमें काफी कुछ आयातित और भारतीय संस्कृति से अलहदा होता है. कहीं-कहीं हल्की सी झलक अवश्य मिलती है, पर उसे ऊँट के मँह में जीरा ही कहा जा सकता है. बच्चों पर आज के धारावाहिक किस तरह से हावी हो रहे हैं, यह तो बच्चों के व्यवहार से ही पता चलता है. आज उनके आदर्श बदल गए हैं. अब वे सामान्य बच्चों से हटकर सोचते हैं. पर उनकी सोच के पीछे अपराध की एक दुनिया होती है. आज कई बच्चे इन्हीं धारावाहिकों से प्रेरणा लेकर अपने विचार को गलत दिशा दे रहे हैं.
बचपन में पढ़ी गई गीजू भाई की बाल कहानियाँ और चीनी लेखिका का बच्चों की मानसिकता को लेकर किया गया सफल प्रयास तोतो चान आज पुस्तकालयों में धूल खा रहीं हैं. बच्चों की कल्पनाशीलता में इन कहानियों के पात्र नहीं उभरते. चाँद पर रहती परियों के बजाए अब उनके मस्तिष्क को अंतरिक्ष की दुनिया में ले जाने वाले आयातित धारावाहिकों के पात्र प्रभावित करने लगे हैं. ऐसे में आवश्यकता है ऐसे धारावाहिकों की, जो बच्चों को उनके वास्तविक संसार से परिचित कराए, उनके बचपन को सींचे, उनकी कल्पनाओं को ऊँची उड़ान दे और उनकी कोमल भावनाओं को एक ऐसा आकार दे, जिससे वे वास्तव में बच्चे बनकर बच्चों का जीवन जी सकें. क्या है हमारी सरकार में ऐसा साहस? यदि इस दिशा में सरकार ही एक कदम बढ़ाए, तो एक नहीं गुलजार, अमोल पालेकर, सईद मिर्जा, सई परांजपे जैसी कई हस्तियाँ सामने आ जाएँगी और वे बनाएँगी बच्चों की ऐसी दुनिया, जिसमें बच्चे अपना भारतीय बचपन जी सकें.

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एक और पोस्ट जो मैं आपसे साझा करना चाहूँगा : मेरा [V] महान बनाम एकता कपूर अवश्य पढ़िये
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8 August 2009

भारतीय कुत्ते

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आज नीरज जी की एक पुरानी पोस्ट पढ़ने को मिला । यूँ देखें तो कुछ ख़ास नहीं, पर सैटायर या हासपरिहास लेखन में सटीकता की दृष्टि से यह साझा करने का मन हुआ । प्रस्तुत है, एक अँश ;

“ और अगर आपको हमारे देश के आवारा कुत्तों की काबिलियत पे शक है, तो दोबारा सोचिये. या रहने दीजिये शायद आप समझ नहीं पायेंगे. वो जूनून जो उनके भीतर है, अगर आपने कभी देखा नहीं है तो मैं आपको बताता हूँ. वो उनका सड़क के किनारे दूर से आते किसी स्कूटर का इन्तेजार करना और फिर एकदम सही टाइमिंग सेट कर के एकदम एंगल बना के, रफ़्तार में आ रहे स्कूटर के दोनों पहियों के बीच से सुरक्षित पार कर होते हुए निकल जाना आसान नहीं है गुरु. वाकई कुत्ता बड़ा daring जीव है

Neeraj Singh, पंचायतनामा, Oct 2008

पूरी पोस्ट मूल साइट पर पढ़ें.

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4 August 2009

हिन्दू धर्म क्या है ?

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इस उद्धरण में विन्सेंट स्मिथ ने हिन्दू-धर्म और हिन्दूपन शब्दों का प्रयोग किया है । मेरी समझ में इन शब्दों का इस तरह इस्तेमाल करना ठीक नही । अगर इनका इस्तेमाल हिंदुस्तानी तह़जीब के विस्तृत मानी में किया जाय, तो दूसरी बात है । आज इन शब्दों का इस्तेमाल, जबकि ये बहुत संकुचित अर्थ में लिये जाते हैं और इनसे एक खास मजहब का ख्याल होता है, गलतफहमी पैदा कर सकता है ।
 हमारे पुराने साहित्य में तो हिन्दू शब्द कहीं आता ही नहीं । मुझे बताया गया है कि इस शब्द का हवाला हमें जो किसी हिन्दूस्तानी पुस्तक में मिलता है, वह है आठवीं सदी ईसवी के एक तांत्रिक ग्रंथ में, और वहां हिंदू का मतलब किसी खास धर्म से नहीं, बल्कि खास लोगों से है । लेकिन यह जाहिर हैं कि यह लफ़्ज़ बहुत पुराना है और अवेस्ता में और पुरानी फारसी में आता है। उस समय, और उस समय से हजार साल बाद तक पश्चिमी और मध्य-एशिया के लोग इस लफ़्ज़ का इस्तेमाल हिन्दुस्तान के लिए, बल्कि सिंधु नदी के इस पर बसने वाले लोगों के लिए करते थे । यह लफ़्ज़ साफ-साफ सिंधु नदी से निकला है और यह इंडस का पुराना और नया नाम है । इस सिंधु शब्द से हिंदू और हिंदुस्तान बने हैं और इंडोस और इंडिया भी। मशहूर चीनी चात्री इत्-सिंग ने, जो हिंदुस्तान में सातवीं सदी ईसवी में आया था, अपनी यात्रा के बयान में लिखा है कि उत्तर की जातियां, यानि मध्य-एशिया के लोग हिंदुस्तान को हिन्दू सीन-तु कहते हैं, लेकिन उसने यह भी लिखा है कि यह आम नाम नहीं है..... हिंदुस्तान का सबसे मुनासिब नाम आर्य-देश है ।
एक खास मजहब के माने में हिंदू  शब्द का इस्तेमाल बहुत बाद का है।
हिंदुस्तान में मजहब के लिये पुराना व्यापक शब्द आर्य-शब्द था । दरअसल धर्म का अर्थ मजहब या रिलिजन से ज्यादा विस्तृत है । इसकी व्युत्पत्ति जिस धातु शब्द से हुई है, उसके मानी हैं एक साथ पकड़ना । यह किसी वस्तु की भीतरी आकृति, उसके आंतरिक जीवन के विधान के अर्थ में आता है । इसके अंदर नैतिक विधान, सदाचार और आदमी की सारी जिम्मेदारियां और कर्तव्य आ जाते है । आर्य-धर्म के भीतर वे सभी मत आ जाते हैं, जिनका आरंभ हिन्दुस्तान में हुआ है, वे मत चाहे वैदिक हो, चाहे अवैदिक । इसका व्यवहार बौद्धों और जैनों ने भी किया है । और उन लोगों ने भी, जो वेदों को मानते हैं । बुद्ध अपने बनाये मोक्ष के मार्ग को हमेशा आर्य-मार्ग कहते थे ।
पुराने जमाने में वैदिक धर्म शब्दों का इस्तेमाल खासतौर पर उन दर्शनों, नैतिक शिक्षाओं, कर्मकांड, और व्यवहार के लिए होता था, जिनके बारे में समझा जाता था कि वे वेद पर अवलंबित हैं । इस तरह से, वे सभी लोग, जो वेदों को आमतौर पर प्रमाण मानते थे, वैदिक धर्म वाले कहलाये ।
सभी कदीम हिंदुस्तानी मतों के लिये - और इनमें बुद्ध मत, और जैन मत भी शामिल है-सनातन-धर्म यानि प्राचीन धर्म का प्रयोग हो सकता है । लेकिन इस पर आजकल हिंदुओं के कुछ कट्टर दलों के एकाधिकार कर रखा हैं, जिनका दावा है कि वे इस प्राचीन मत के अनुयायी है ।
बौद्ध धर्म और जैन धर्म यकीनी तौर पर हिंदू धर्म नहीं है और न वैदिक धर्म ही है । फिर भी उनकी उत्पत्ति हिंदुस्तान में ही हुई और ये हिंदुस्तानी जिंदगी, तहजीब और फ़लसफे के अंग हैं । हिंदुस्तान में बौद्ध और जैनी हिंदुस्तानी विचार-धारा और संस्कृति की सौ फीसदी उपज हैं, फिर भी इनमें से कोई भी मत के ख्याल से हिंदू नहीं है ।
इसलिये हिंदुस्तानी संस्कृति को हिंदू संस्कृति कहना एक सरासर गलतफहमी फैलाने वाली बात है । बाद के वक्तों में इस संस्कृति पर इस्लाम के संपर्क का बड़ा असर पड़ा, लेकिन यह फिर भी बुनियादी तौर पर और साफ-साफ हिंदुस्तानी ही बनी रही । आज यह सैकड़ों तरीकों पर पश्चिम की व्यावसायिक सभ्यता के जोरदार असर का अनुभव कर रही है और यह ठीक-ठीक बता सकना मुश्किल है कि इसका नतीजा क्या होकर रहेगा ।
हिंदू-धर्म जहां तक कि वह एक मत है, अस्पष्ट है, इसकी कोई निष्चित रूपरेखा नहीं, इसके कई पहलू हैं और ऐसा है कि जो चाहे इसे जिस तरह का मान ले । इसकी परिभाषा दे सकना या निश्चित रूप में कह सकना कि साधारण अर्थ में वह एक मत है, कठिन है । इसकी मौजूदा शक्ल में, बल्कि बीते हुए जमाने में भी इसके भीतर बहुत से विश्वास और कर्मकाण्ड आ मिले हैं, ऊँचे से ऊँचे और गिरे से गिरे, और अकसर इनमें आपस का विरोध भी मिलता है ।
इसकी मुख्य भावना यह जान पड़ती है कि अपने को जिंदा रखो ओर दूसरे को भी जीने दो । महात्मा गांधी ने इसकी परिभाषा देने की कोशिश की है-अगर मुझसे हिंदू मत की परिभाषा देने को कहा जाय, तो मैं सिर्फ यह कहूंगा कि यह अहिंसात्मक साधनों से सत्य कीखोज है । आदमी चाहे ईश्वर में विश्वास न रखे, फिर भी वह अपने को हिंदू कह सकता है ।
हिंदू-धर्म सत्य की अनथक खोज है......... हिंदू-धर्म सत्य को मानने वाला धर्म है । सत्य ही ईश्वर है । हम इस बात से परिचित हैं कि ईश्वर से कईयों द्वारा इन्कार किया गया है । हमने सत्य से कभी इन्कार नहीं किया है । गांधी जी इसे सत्य ओर अहिंसा बताते हैं, लेकिन बहुत से प्रमुख लोग, जिनके हिंदू होने में काई संदेह नहीं, यह कह देते हैं कि अहिंसा, जैसा उसे गांधी जी समझते हैं, हिंदू मत का आवश्यक अंग नहीं हे । तो फिर हिंदू मत का अकेला सूचक चिन्ह सत्य रह जाता है । जाहिर है यह कोई परिभाषा नहीं हुई ।
इसलिस हिंदू और धर्म शब्दों का हिंदुस्तानी संस्कृति के लिए इस्तेमाल किया जाना न तो शुद्ध है और न मुनासिब ही है, चाहे इन्हें बहुत पुराने जमाने के हवाले में ही क्यों न इस्तेमाल कर रहे हों, अगरचे बहुत से विचार, जो प्राचीन ग्रन्थों में सुरक्षित हैं, इस संस्कृति के उद्गार हैं । ओर आज तो इन शब्दों का इस अर्थ में इस्तेमाल किया जाना और भी गलत है । जब तक पुराने विश्वास और फिलसफे सिर्फ जिंदगी के एक मार्ग और संसार को देखने के एक रूख के रूप थे, तब तक तो अधिकतर हिंदुस्तानी संस्कृति का पर्याय हो सकते थे । लेकिन जब एक से ज्यादा पाबंदीवाले मजहब का विकास हुआ, जिसके साथ न जाने कितने विधि विधान और कर्म-कांड लगे हुये थे, तब यह उससे कुछ आगे बढ़ी हुई चीज थी और साथ ही उस मिली-जुली संस्कृति के मुकाबले में घटकर भी थी । एक ईसाई या मुसलमान अपने को हिंदुस्तानी जिंदगी और संस्कृति के मुताबिक ढाल सकता था और अक्सर ढाल लेता था, और साथ ही जहां तक मजहब का ताल्लुक है, वह कट्टर ईसाई या मुसलमान बना रहता था । उसने अपने को हिंदुस्तानी बना लिया था और बिना अपना मजहब बदले हुये हिंदुस्तानी बन गया था ।
हिंदुस्तानी के लिए ठीक शब्द हिंदी होगा, चाहे हम उसे मुल्क के लिए, चाहे संस्कृति के लिए और चाहे अपने भिन्न परंपराओं के तारीखी सिलसिले के लिए इस्तेमाल करें। यह लफ़्ज़ हिंद से बना है, जो हिंदुस्तान का छोटा रूप है । अब भी हिंदुस्तान के लिए हिंद शब्द का आमतौर पर प्रयोग होता है । पश्चिमी एशिया के मुल्कों में, ईरान और टर्की में, इराक, अफगानिस्तान, मिस्त्र और दूसरी जगहों में, हिंदुस्तान के लिए बराबर हिंद शब्द का इस्तेमाल किया जाता है और इन सभी जगहों में हिंदुस्तानी को हिंदी कहते हैं । हिंदी का मजहब से कोई संबंध नहीं और हिंदुस्तानी मुसलमान और ईसाई उसी तरह से हिंदी है, जिस तरह कि एक हिंदू मत का मानने वाला ।
अमरीका के लोग जो सभी हिंदुस्तानियों को हिंदू कहते हैं, बहुत गलती नहीं करते । अगर वे हिंदी शब्द का प्रयोग करें, तो उनका प्रयोग बिलकुल ठीक होगा । दुर्भाग्य से हिंदी शब्द हिंदुस्तान में एक खास लिपि के लिए इस्तेमाल होने लगा है-यह भी संस्कृत की देवनागरी लिपि के लिए-इसलिए इसका व्यापक और स्वाभाविक अर्थ में इस्तेमाल करना कठिन हो गया है । शायद जब आजकल के मुबाह से खत्म हो लें, तो हम फिर इस शब्द का इस्तेमाल उसके मौलिक अर्थ में कर सकें और वह ज्यादा संतोषजनक होगा । आज हिंदुस्तान के रहने वाले के लिए हिंदुस्तानी शब्द का इस्तेमाल होता है और जाहिर है कि वह हिंदुस्तान से बनाया गया है, लेकिन बोलने में यह बड़ा है और इसके साथ वे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ख्याल नहीं जुड़े हैं, जो हिंदी के साथ जुड़े है, निश्चय ही, प्राचीन काल की हिंदुस्तान की संस्कृति के लिए हिंदुस्तानी शब्द का इस्तेमाल अटपटा जान पड़ेगा ।
अपनी सांस्कृतिक परंपरा के लिए हम हिंदी या हिंदुस्तानी, जो भी इस्तेमाल करें, हम यह देखेंगे कि पुराने जमाने में समन्वय के लिए यहां एक भीतरी प्रेरणा रही है और हमारी तहजीब और कौम के विकास का आधार, खासकर हिंदुस्तान का, फिलासफियाना रूख रहा है । विदेशी तत्वों का हर हमला इस संस्कृति के लिए एक चुनौती था और उनका सामना इसने हर बार एक नये समन्वय के जरिये, उन्हें अपने में जज्ब करके किया है । इस तरीके से उसका काया-कल्प भी होता रहा है और अगरचे पृष्ठभूमि वही रही है और बुनियादी बातों में कोई खास तब्दीली नहीं हुई है ।
इस समन्वय के कारण संस्कृति के नये-नये फूल खिले हैं । सी०ई०एम० जोड ने इसके बारे में लिखा है-इसकी वजह जो कुछ भी हो, वाकया यह है कि कौमों के जुदा तत्वों के समन्वय की ओर विभिन्नता से एकता पैदा करने की योग्यता और तत्परता दिखाई है । 
लेखक- जवाहरलाल नेहरू
आलेख स्रोत - भारत एक खोज Discovery Of India
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