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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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4 February 2010

जोशिम ओर फुग्गो की बिरादरी

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सोचता   हूँ  कविता को परिभाषा  कितनी कठिन होगी ...  ...नियम हिज्जे के कानून ख्याल   को  कैसे   बाँध सकते  है  .....अक्सर जब ख्यालो  की रवानगी रुक  जाती है तो कंप्यूटर के दरवाजे खटखटाता हूँ ...लोगो को मुश्किलें होती होगी पर मुझे अक्सर मन चाहा मिल जाता है....जोशिम ऐसे ही एक खयालो के  जंगल  में घूमते आवारा बंजारे से है ...जिनके झोले में ढेरो जादुई फलसफे है ....आप उन्हें जितनी बार पढेगे नया सा कुछ मिलेगा ....कोर्स की किताब जैसा .......


किताब-हिसाब !

याने अफसाना नंबर दो ; उर्फ़ जहाज का पंछी; उर्फ़ घुमक्कड़नामा - एक]

क्या किया? क्या ना किया?, किस भीड़ से कथनी निकाली
क्यों थमे? कब चल पड़े? बहते बसर, सैलाब से अटकल मिलाली
कुछ इस तरह बस्तों ने शब्दों से वफ़ा ली

इतने इलाके घूम-चक्कर
बैठ घर दम फूलता
प्रतिरोध का ऊबा लड़कपन
पोस्टरों सा झूलता

हाँ दबदबा दब सा गया
जब लीक में बूड़े महल
पर शोर डूबे हैं नहीं
तैयार हैं, जब हो पहल

बेढब सफ़ों में मिर्च डाली, हो सका जितना नयी कोशिश निकाली
इंतजारों में खलल की फिक्र फेंकी, चुहल में कदमों से दो मंजिल जुड़ाली
हाँ इस तरह ......

यारों की भी, थी सूरतें,
ईमारतें रहमो करम
पर भागते कांटे रहे
भरते भरे बोरों शरम

कुछ भरम छूटे हाथ रूठे
किस्मतें घुलती रहीं
आवारगी आंखों की जानिब
उम्र संग ढलती रहीं

जिस आँख से चकमक मिले, उनकी पकड़ धक्-धक् सम्हाली,
कुछ मौन से, कुछ फोन से, बतझड़ भरे, रहबर मिली होली-दिवाली
हाँ इस तरह ......

सब खोह में मौसम न थे ,
कुछ काम भटके जाप थे
ताने सुने बाने बुने
हिस्सों में बंट कुछ शाप थे

कुछ रंग कुछ जोबन करा
कुछ झाड़ डैने छुप धरा
छौंके हुए अफ़सोस ने
कायम सा कुछ रोगन भरा

हिम्मत भी जैसी जस मिली, वो हौसलों में नींव डाली
ताली-दे-ताली पैर पटके, ढोल पीटे, हिनहिना सीटी बजा ली
हाँ इस तरह ......


ओर यहाँ वे किसी नियम से बंधे नहीं है ......अपनी रवानगी में अपने स्टाइल में ......अपने बिंदास अंदाज में ..खास तौर में जिस तरीके से वे कुछ  शब्दों का इस्तेमाल करते है ......जैसे कविता के नीचे लिखे शब्द........

कोट पीस दफ्तरी
उर्फ़ नौकरी की छनी खीज - - दोस्तों के शब्दों में - नग़्मा- ए- ग़म-ए-रोज़गार ]

कमख़्वाब नींद, कमनज़र ख़्वाब, डर मुंह्जबानी
ऊबे निश्वास, भटके विश्वास, उफ़ किस्से-कहानी

सुबह होड़-दौड़, शाम आग-भाग, कौतुकी खट राग,
मृगया मशक्कत, दीवानी कसरत, धौंस पहलवानी

कूद-कूद ढाई घर, बैठ सवा तीन, बिसात रंगीन
मग़ज़ घोर शोर, रीढ़ कमज़ोर, गुज़र-नौजवानी

फा़ईल खींच-खांच, नोटशीट तान, फ़र्शी गुन गान
रग-रग पे खून, खालिस नून-चून, रंग साफ़-पानी

नमश्कार-पुरश्कार, आदाब-अस्सलाम, सादर-परनाम
ठस आलमपनाह, हुकुम बादशाह, चिड़ी की रानी


ओर ये मेरी फेवरेट है ....जाने क्यों मुझे बेहद पसंद है .....जाने क्यों.........

फुग्गो की बिरादरी

क्या अभी भी यार तुम, शामें उड़ाते हो ?

चौंकते हो रात में
परछाईयों को बूझते हो,
पलट कम्बल मुंह उलट
लम्बाईयों में ऊंघते हो,
दिन सुने किस्से कहानी
नित अकेले सूंघते हो,
और फ़िर तख्ता पलट कर
चोर मन में गूंधते हो

क्या गुल्लकों में डर डरे नीदें जगाते हो ?
क्या अभी भी ....

तुम, तुम के आने से
अभी कुप्प फूलते हो क्या,
तभी तो सज संवर पुर जोर
मिस्टर कूदते हो क्या,
फुदक कर बात, बातों में
शरम से सूजते हो क्या,
और फ़िर तंज़ तानों से
तमक कर रूठते हो क्या,

क्या हक्लकाकर, मिचमिचा आँखें बनाते हो ?
क्या अभी भी .....

चिरोंजी छीलते हो
टेसुओं से रंग करते हो,
दबा कर पत्तियों को
तितलियों को तंग करते हो,
फकत झकलेट मौकों में
जबर की जंग करते हो,
बचा जो कुछ भी करते हो
सबर के संग करते हो,

तमातम फूँक कर सेमल के लब, फाहे बनाते हो ।
....
कहो न यार तुम इस दम तलक, कंचे लुकाते हो ।
....
कहो तो यार उन सीपों से तुम, कैरी छिलाते हो ।
....
फिर कहो अनकही सांसों से तुम, फुग्गे फुलाते हो ।

कहो ....


[प्यादे को पहलवान के .. आस पास ... बनने में अभी बहुत .. बहुत .. बहुत .. वक़्त है - (लेकिन लिखता कौन कमबख्त है सूरमा बनने के लिए) - उम्मीद से ज्यादा अपेक्षाओं( http://tarang-yunus.blogspot.com/2007/12/blog-post_27.html )का तहेदिल ... ]

4 सुधीजन टिपियाइन हैं:

Arvind Mishra टिपियाइन कि

उम्दा

नीरज गोस्वामी टिपियाइन कि

जोशिम साहब का मैं पुराना फैन हूँ...उनके शब्दों का दीवाना हूँ...उनकी शैली सबसे अलग और अनूठी है...वो बहुत कम लिखते हैं, बहुत कम याने बहुत ही कम लेकिन जब लिखते हैं कमाल करते हैं...दुबई में रझते हैं आजकल उनकी कोई खबर नहीं है...आपको कुछ सूचना मिले तो बतईयेगा...
नीरज

डा. अमर कुमार टिपियाइन कि


इस ब्लॉगपृष्ठ को समय समय पर ऑक्सीज़न देकर जिन्दा रखने का भी अतिशय धन्यवाद ।
मुझे तो ऊपर की यह रचना बहुत ही अपील कर रही हैं, इसे एक बार फिर से दोहरा लेना चाहता हूँ...


कमख़्वाब नींद, कमनज़र ख़्वाब, डर मुंह्जबानी
ऊबे निश्वास, भटके विश्वास, उफ़ किस्से-कहानी

सुबह होड़-दौड़, शाम आग-भाग, कौतुकी खट राग,
मृगया मशक्कत, दीवानी कसरत, धौंस पहलवानी

कूद-कूद ढाई घर, बैठ सवा तीन, बिसात रंगीन
मग़ज़ घोर शोर, रीढ़ कमज़ोर, गुज़र-नौजवानी

फा़ईल खींच-खांच, नोटशीट तान, फ़र्शी गुन गान
रग-रग पे खून, खालिस नून-चून, रंग साफ़-पानी

नमश्कार-पुरश्कार, आदाब-अस्सलाम, सादर-परनाम
ठस आलमपनाह, हुकुम बादशाह, चिड़ी की रानी

साथ ही, यदि ईमानदारी से स्वीकार करूँ तो मैं ज़ोशिम को कभी गँभीरता से न ले पाया था ।
मुझे बेध्यानी की गुस्ताख़ नींद से जगाने का शुक्रिया ।

वन्दना अवस्थी दुबे टिपियाइन कि

बस " कमाल है" शब्द ही सूझ रहे हैं...

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

आपकी टिप्पणी ?


कुछ भी.., कैसा भी...बस, यूँ ही ?
ताकि इस ललित पृष्ठ पर अँकित रहे आपकी बहूमूल्य उपस्थिति !

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