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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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26 April 2010

अज़ीब आदमी

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उन दिनों सरकार  ने  बाहर  जाने  पर  कड़ी  पाबंदी  लगा  रखी  थी   और  क्योंकि  बुलावा  केवल  धर्म  और  रणधीर  का था, इसलिए मंगला और दिल्लू नहीं जा सकती थी। बड़ी दौड़-भाग की, लेकिन  वक्त  न हीं था । धर्म  ने कहा कि वह  भी नहीं जाएगा, तो रणधीर ने कहा, वह अकेला चना क्या भाड़ फोड़ने जाएगा ।

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नहीं भई, अपनी पहली फिल्म जा रही है । आप लोगों का जाना बहुत जरूरी है । केशव ने राय दी।
नहीं, मंगला नहीं जा सकती, इसलिए मै नहीं जाउंगा ।
अरे तो क्या हुआ तुम चले जाओ । विलायत भागा थोड़े ही जाता है, फिर चले जाएंगे । मंगला ने आग्रह किया। उसके फरिश्तों को भी मालूम न था कि जरीना और आमिना इंग्लैण्ड गई हुई है । वहां से वह भी जर्मनी जाएंगी। मीना को उसके पतिदेव ने नहीं जाने दिया, क्योंकि उनका भी बुलाया नहीं था, बेचारी रो-पीट कर चुप हो गई ।

बात बिगड़ने पर तुली हुइ्र थी । किसी फुर्तीले फोटाग्राफर ने दूसरे ही दिन अखबार के लिए वहां खींचे हुए फोटो भेज दिए और जब वे फोटो छपे तो मंगला पर जैसे बिजली गिर पड़ी । बच्चे पार्क में खेलने गए हुए थे । वह फटी-फटी आंखों से फोटो देखती रही । हर फोटो में धर्म और जरीना साथ थे । चालाक फोटोग्राफर ने आमिना और रणधीर को इस सफाई से काटा था कि सिर्फ़ उनके ही वहाँ होने का सन्देह भी न होता था, और उनके सम्बन्ध में सांकेतिक रूप से कुछ छींटे भी कसे गए थे । पुराने तनाव का भी जिक्र था, मंगला की अनुपस्थिति का हवाला भी दिया था । ऐसा मालूम होता था, धर्म जानबूझकर उसे नहीं ले गया, ताकि वहां दोनों गुलछर्रें उड़ा सकें । कई बार जी चाहा, गिलास में सारी की सारी नींद लाने वाली गोलियां उडेलकर इस जानलेवा दुख को खत्म कर डाले कि पीछा छूटे ।
लेकिन फिर सोचा, वह तो वे दोनों चाहते ही है । नहीं इस जन्म में तो उन्हें खुख नहीं करना है । लेकिन जब ले जाने का इरादा नहीं था, तो उसने कहा क्यों था । शायद इसलिए कि मैं नागपुर न जा सकूं, मेरा प्रोग्राम भंड करके खुद चला जाए क्योंकि उसमें मुहम्मद रफी है । मुहम्मद रफी से बैर है ।  इसलिए कि वह मुझे काम देता है तो श्रीमानजी की बेइज्जती होती है ।

सुबह रफी की पार्टी नागपुर जा रही है । उसने फौरन फोन किया । लेकिन वहां गाउंगी क्या ? कुछ तैयारी भी नहीं की है । रहने दो ।
अरे नहीं, नहीं यह नहीं हेा सकता । तुम्हें चलना पड़ेगा । कुछ भी गा देना ।
रफी और मंगला रात डेढ़ बजे तक हारमोनियम पर रिहर्सल करते रहे ।

धर्म को प्लेन ही में मालूम हेा गया था कि वहां वह भी आ रही है । वह बड़ी उदारता और लापरवाही से हंस दिया ।
कैसी हो ? धर्म ने जरीना को देखकर औपचारिकता से पूछा ।
अच्छी हूं, आप तो बहुत बिजी है न, पिक्चर शुरू हो गई है न ? इंग्लैण्ड में बड़ा मजा आया । मैनें तो कहा, आओ आमिना आपा यहां खो जाए.........। बड़बड़ बड़बड़ घँटों वह बकती रही । धर्म के माथे पर नमी आई ।
धर्म ने उसके कंधे को छुआ और जब मुड़ी तो उसके सामने हथेली फैला दी ।
सदियां भागती-दौड़ती गुजर गई, युग बीत गए ।
वह मुटिठयां भींचे उसके हथेली को घूर रही थी ।
वह देखा, आमिना ने घसीटकर उसे अपने आगे कर लिया । और फव्वारे के पास छूटती हुई आतिशबाजी देखती रही ।
धर्म ने मुटठी बंद करके जेब में डाल ली । उसकी नर्म-नर्म आखों में आतिशबाजी का अक्स धड़धड़ जल रहा था । वह रात रणधीर ने मोर्चें पर बिताई । उसे धर्म के पागलपन में कोई शक नहीं रहा था । उसने कभी एक इंसान को बिना खून की एक बूंद बहाए यों फड़फड़ाते नहीं देखा था ।
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नागपुर का प्रोग्राम काफी सफल रहता अगर ऐन वक्त पर मंगला जरूरत से ज्यादा पीकर स्टेज पर न आ जाती । किसी को आशंका न थी कि वह इस हद तक आदी हो चुकी है । सुबह से वह होटल में अपने कमरे में बन्द पड़ी थी । जब वह झूमती-लड़खड़ाती स्टेज पर आई तो सब अचम्भे में रह गए । उलझे बाल, बेतरतीब कपड़े । इधर आर्केस्टा ने साज मिलाए उधर उसे बड़े जोर की उबकाई ने धर दबोचा । मारे सडांध के नाकें सड़ गई । बड़ी मुश्किल से उसे बाहर ले गए ।
अखबार में पूरे विवरण के बाद लिखा था कि धर्म जर्मनी गया हुआ है और शायद मंगला का पैर भारी है ।
क्या जरूरत थी जाने की ? मैने मना किया था । वह एकदम नर्म पड़ गया, मुझे बताया भी नहीं मंगलू ने ।
तुम्हें फुर्सत मिले तो बताए । यार, गर्दन उड़ा देने के काबिल हो । तुम जैसी उसकी बेकद्री करते हो, वही है जो बर्दाश्त कर ही है । कोई और होती तो कभी की तुम्हारे जनम में थूक कर अलग हो गई होती ।
अबकी फिर बिटिया दो, और हम भी ऐसी सुपर हिट फिल्म बनाएंगे कि दुनिया देखती रह जाएगी । उसने मंगला के बेड पर बैठकर उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा ।
बिटिया । हुंह, भगवान न करें । उसने धर्म का हाथ झटक दिया और ऐसे दूर हट गई जैसे वह कोढ़ी हो ।
मंगलू......................
बाबा, यह चोंचले वहीं बघारो जाकर । वह बेड से उठकर डेसिंग टेबुल पर जा बैठी । दराज खोलकर उसने गिलास में थोड़ी सी व्हिस्की डाली और कंघी करने के लिए चोटी खोलने लगी ।
मंगलू, यह सबेरे सबेरे..।
तो ? मंगला ने जैसे उसे चिढ़ाने के लिए नीट पीनी शुरू कर दी ।
यह अच्छा नहीं मंगला ।
क्या अच्छा है और क्या अच्छा नहीं, यह मैं भी जानती हूं । तुम क्यों फिक्र में घुलू जाते हो ।
मंगला ।
अरे बाबा, जाओ न अपनी गुलबदन के पास । बड़ी मुश्किल से तो रूठी देवी को मनाया है, कहीं फिर न रूठ जाए ।
धर्म उसकी आखों का जहर न बर्दाश्त कर सका, तेजी से बाहर निकल गया । मंगला ने दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया और कुंडी चढ़ा ली ।

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अभी मंगला और धर्म के अलग हेा जाने के बारे में हर एक को मालूम न हुआ था ।
बाहर दरवाज़े पर फ़रीद खड़ा था और फरीद ने तो अभी इंडस्ट्री में पांव भी न रखा था । फिल्मी पति घरों में कम ही मिलते है । मंगला ने धर्म के घर में न होने की कोई चर्चा न की ।
बोलने जा रही थी, अरे उनके कहने का क्या ठीक ! लेकिन फिर वह संभल गई, बोली कि भूल गए होंगे ।
मैं यह पूछने आया था कि शूटिंग है कि नहीं । उन्होंने कहा था, शूटिंग शुरू होगी तब सेट पर ही टेस्ट लेंगे । टेलीफोन पर कोई ठीक से जवाब नहीं देता ।
फिल्म लाइन पसन्द है ।
हां, अगर चांस मिल जए तो..............।
अरे बड़ी गन्दी लाइन है, कुछ और काम करो न ।
कहां मिलता है काम ! एक फिल्म लाइन है जहां योग्यता धरी रह जाती है बस किस्मत चलती है ।
अरे दुनिया में हजारों काम है ।
मगर फिल्म लाइन में क्या बुराई है ?
क्या बुराई नहीं यह पूछो । तुम तो रोज मजे करते फिरोगे, बीबी सिर पकड़कर नसीब को रोएगी ।
बीबी है ही नहीं तो रोएगी कहां से ! वह हंसा ।
कभी तो आयेगी ।
क्या आएगी ? मैं शादी हीं नहीं करूंगा ।
हाय राम, घर नहीं बसाओगे । मंगला अपनी धुन में कहती चली जा रही थी । उसे एकाएक ऎसी बातें नहीं छेड़नी चाहिए थी ।
चाय लोगे कि कुछ ठंडा ?
जी, अब चलूंगा।
वह खड़ा हो गया ।
अरे बैठो न.........उसने फरीद का आस्तीन पकड़कर बैठा लिया । जब उसने व्हिस्की पेश की तो फरीद सिटपिटा गया ।
क्यों, पियो न बहुत जरा सी दी है मैंने ।
नहीं । फरीद तकल्लुफ करने लगा ।
अरे इतना बड़ा ताड़ सरीखा हो गया । क्या अभी तक दूध ही पीता हैं मंगला मूड में थी ।
डैडी.. वह झिझक गया ।
तेरे डैडी नहीं पीते ? खूब पीते है । कभी तुझे नहीं पिलाई ? सच्ची कि झूठ बोल रहा है ?
फरीद हंसने लगा, यार दोस्तों के साथ चखी तो है ।
तो बस, लो दो बूंद तो है ही । बड़े तक्ल्लुफ से उसने गिलास ले लिया ।

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इन्सानी रिश्तों के नाजुक पहलुओ पर अभिनय करते-करते वह यह याद न रख सके कि यह मात्र एक्टिंग है और कुछ नहीं ? और बस अन्दर ही अन्दर एक नई प्रणय कथा पनपने लगी....एसी परिस्थितियां जिन्होंने न केवल धर्म को ही अजीब आदमी बना डाला, बल्कि जरीना भी एक रहस्य बनकर रह गई.................

साभार : अज़ीब आदमी - इस्मत चुग़ताई

अब चँद अल्फ़ाज़ मेरे भी :
झकरोर देने वाला उपन्यास-अँश, यही न ? ऎसा ही कुछ पिछले दिनों डा. अनुराग आर्य से बातचीत के दौरान हमने महसूस किया कि जो कुछ हम पढ़ते हैं, या पढ़ चुके हैं.. वह फौरी तौर पर आपको अपसेट कर देते हैं, कुछ हफ़्तों तक यादों में बसे रहते हैं, बाद के महींनों में वह आपको हॉन्ट तो करते हैं, पर जैसे धुँधले साये की मानिंद । वह हूबहू   अपनी शक्लो सूरत के साथ दिमाग में नहीं चढ़ते, बस अपने होने की ताक़ीद करते रहते हैं, " जरा याद करो, तुमने मुझे पढ़ा था " गोया आपकी बिसरी हुई महबूबा रिश्तों के गुज़र-बीतने का याकि भुला दिये जाने का उलाहना दे रही हो । जैसे वह बेवफ़ाई की लानतें भेज रहीं हों कि, कभी मैंनें इन लफ़्ज़ों के जरिये तुम्हारे ज़ज़्बातों को सींच सींच कर इस मुकाम पर ला खड़ा किया, और.. तुम ? अलसाये हुये तन्हा लम्हों में आप उस तक पहुँचना चाहते हैं, उसे दुबारा सहला कर अपने को ताज़ा करना चाहते हैं, पर आलस का अपना एक अलग  तक़ाज़ा आपको बेबस किये रहता है, " तुम शायद पीछे कमरे के सेल्फ़ में पड़ी होगी, इस मुई आलस से फ़ारिग़ होकर मैं तुम तक बस पहुँचता ही हूँ !"
उन सफ़हों से जिन्होंने हमें सहारा दिया, ऎसे ऎसे ज़ज़्बे दिये कि हम हँस पड़े तो रोये भी हैं, हमारे नाशुक्रेपन की यह बातें आयी गयी हो जाती हैं । तो.. अनुराग से बातचीत में सोचा यह गया कि अग़र हम ऎसा कुछ पढ़ें, तो उसे नेट के किसी कोने पर दर्ज़ कर दिया करें, यही एक ऎसा ज़रिया है कि, हम हिन्दोस्ताँ में पढ़े सफ़हे, तलब लगने पर कनाडा में भी हासिल कर सकते हैं । वाह, क्या बात है.. और हमने एक दूसरे से विदा ली ! इस दरम्यान तमाम समय मुझे इस्मत आपा का यह अज़ीब आदमी याद आता रहा । इसे पिछले 15 सालों में मैंनें तकरीबन 20 बार तो पढ़ा ही होगा, जबकि बीच बीच में इसके पन्नों का उलटते रहना इसमें शामिल नहीं है । इस क़दर कि मेरी दुर्गा-सप्तशती की तरह यह भी बेशुमार पैबन्दों के सहारे मेरे पास बावस्ता है । इसकी एक और भी वज़ह है, उसका खुलासा इन लाइनों के बाद..
जब यह एक उर्दू रिसाले में सिलसिलेवार छप रहा था, उसी समय से यह कयास लगने लगा कि इस अफ़साने के किरदारों में..  ज़रीना शायद वहीदा रहमान हैं
मँगला गीता दत्त को मान लीजिये ( उन दिनों का उनका गाया गीत ’ आज सज़न मोहे अँग लगा ले, जनम सफल हो जाये, हिरदै की पीड़ा प्रेम की अग्नी.. " दर्द की कुदरती शिद्दत के साथ आज भी मुझे उतना ही परेशान करती है, जितना गीतादत्त को उनकी तन्हाईयों और रुसवाईयों ने किया होगा )
धर्म को गुरुदत्त न मानने की लोगों ने कोई वज़ह न देखी ।
वक़्त के पहले की सोच पर चलने वाले गुरुदत्त मेरे पसँदीदा तो हैं ही, ग़र वह इस्मत आपा की कलम से मौज़ूँ हुये हों.. तो फिर इस नॉवेल को पैबन्दों के सहारे कौन न ज़िन्दा रखना चाहेगा ?
और फ़रीद ? फ़रीद मैं आप पर छोड़ता हूँ !

 

 

2 सुधीजन टिपियाइन हैं:

honesty project democracy टिपियाइन कि

अच्छी जानकारी से भरी विवेचना को ब्लॉग पर सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद /ऐसे ही प्रस्तुती और सोच से ब्लॉग की सार्थकता बढ़ेगी / आशा है आप भविष्य में भी ब्लॉग की सार्थकता को बढाकर,उसे एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित करने में,अपना बहुमूल्य व सक्रिय योगदान देते रहेंगे / आप देश हित में हमारे ब्लॉग के इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर पधारकर १०० शब्दों में अपना बहुमूल्य विचार भी जरूर व्यक्त करें / विचार और टिप्पणियां ही ब्लॉग की ताकत है / हमने उम्दा विचारों को सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / इस हफ्ते उम्दा विचार के लिए अजित गुप्ता जी सम्मानित की गयी हैं /

डॉ .अनुराग टिपियाइन कि

सच कहा वैसे तो हम लगे हाथ ये भी एप्लीकेशन दे देते है के अपनी पुराणी पोस्टो की री ठेल कीजिये .कई तो हमारी भी बांची हुई नहीं है

लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...

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कुछ भी.., कैसा भी...बस, यूँ ही ?
ताकि इस ललित पृष्ठ पर अँकित रहे आपकी बहूमूल्य उपस्थिति !

इन रचनाओं के यहाँ होने का मतलब
अँतर्जाल एवं मुद्रण से समकालीन साहित्य के
चुने हुये अँशों का अव्यवसायिक सँकलन

(संकलक एवं योगदानकर्ता के निताँत व्यक्तिगत रूचि पर निर्भर सँग्रह !
आवश्यक नहीं, कि पाठक इसकी गुणवत्ता से सहमत ही हों )

उत्तम रचनायें सुझायें, या भेजे !

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