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छितरी इधर उधर वो शाश्वत चमक लिये
देखी जब रेत पर बिखरी अनाम सीपियाँ
मचलता मन इन्हें बटोर रख छोड़ने को
न जाने यह हैं किसका इतिहास समेटे

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15 March 2010

हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था .....

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परवीन शाकिर...गर आज़ाद नज़्म को बेबाकी से कहना भी एक हुनर है ... तो यकीन मानिये इस हुनर में इनका जवाब नहीं.....
हमारे  दरमिया  ऐसा कोइ  रिश्ता नहीं  था 
तेरे  शानो  पे  कोई चाहत   नहीं थी  
मेरे  जिम्मे  कोई  आँगन  नहीं  था 
कोई  वादा  तेरी ज़ंजीर -ए -पा  बनने  नहीं पाया 
किसी  इक़रार  ने  मेरी कलाई  को  नहीं  थामा  
हवा -ए -दश्त  की  मानिंद  
तू  आज़ाद  था 
रास्ते  तेरी  मर्जी  के  तबे  थे  
मुझे  भी  अपनी  तन्हाई  पे  
देखा  जाए  तो  
पूरा  तसर्रुफ़  था  
मगर  जब  आज  तू  ने  
रास्ता  बदला  
तो  कुछ ऐसा  लगा मुझ  को  
के  जैसे  तू  ने  मुझ  से  बेवफाई  की 
 
 
2) 
खलिश 

अजीब  तर्ज़ -ए -मुलाक़ात  अब  के  बार  रही  

तुम्ही  थे  बदले  हुए  या  मेरी  निगाहें  थी  
तुम्हारी  नज़रो . से  लगता  था  जैसे  मेरी  बजाये  
तुम्हारे  घर  में . कोई  और  शख्स  आया  है  
तुम्हारे  ओहदे  की  देने . तुम्हें  मुबारक  

सो  तुम  ने  मेरा  स्वागत  उसी  तरह  से  किया  
जो  अफसरान -ए -हुकूमत  के  ऐताकाद  में . है  
तकल्लुफ़ान  मेरे  नज़दीक  आ  के  बैठ   गए  
फिर  एहतमाम  से  मौसम  का  ज़िक्र   छेड़   दिया  

कुछ  उस  के  बाद  सियासत  की  बात  भी  निकली  
अदब  पर  भी  कोई  दो  चार  तबसरे  फरमाए  
मगर  न  तुम  ने  हमेशा  की  तरह  ये  पूछा  
क्या  वक़्त  कैसा  गुज़रता  है  तेरा  जान -ए -हयात  

पहाड़  दिन  की  अज़ीयत  में . कितनी  शिद्दत  है  
उजाड़  रात  की  तन्हाई  क्या  क़यामत  है  
शबो  की  सुस्त  रवी  का  तुझे  भी  शिकवा  है  
गम -ए -फ़िराक  के  किस्से  निशात -ए -वस्ल  का  ज़िक्र  
रवायातन  ही  सही  कोई  बात  तो  करते  

3)
पूरा  दुःख  और  आधा  चाँद  
हिज्र  की  शब्  और  ऐसा  चाँद  

 इतने  घने  बादल  के  पीछे  
कितना  तनहा  होगा  चाँद  

मेरी  करवट  पर  जाग  उठे  
नींद  का  कितना  कच्चा  चाँद  

सेहरा  सेहरा  भटक  रहा  है  
अपने  इश्क  में . सच्चा  चाँद  

रात  के  शायद  एक  बजे  है . 
सोता  होगा  मेरा  चाँद  


4)

सब्ज़  मद्धम  रोशनी  में  सुर्ख  आँचल  की  धनक  
सर्द  कमरे  में  मचलती  गर्म  साँसों  की  महक  

बाजूओं  के  सख्त  हल्के  में . कोई  नाज़ुक  बदन  
सिलवटें  मलबूस  पर  आँचल  भी  कुछ  ढलका  हुआ  

गरमी -ए -रुखसार  से  दहकी  हुई  थांडी  हवा 
नर्म  जुल्फों  से  मुलायम  उँगलियों  की  छेड़  छाड़ 

सुर्ख  होंठो  पर  शरारत  के  किसी  लम्हे  का  अक्स  
रेशमी  बाहों  में  चूड़ी  की  कभी  मद्धम  धनक  

शर्मगी . लहजो .में . धीरे  से  कभी  चाहत  की  बात  
दो  दिलो  की  धडकनों  में  गूँजती  थी  एक  सदा  

कांपते  होंठो पे  थी  अल्लाह  से  सिर्फ  एक   दुआ  
काश  ये  लम्हे  ठहर  जाए . ठहर  जाए  ज़रा  

 5)
गुमान 

मै  कच्ची नींद  में  हूँ  
और  अपने  नीम _ख्वाबीदा  तनफ्फुस   में . उतरती  
चाँदनी  की  चाप    सुनती हूँ  
गुमान  है  
आज  भी  शायद  
मेरे  माथे  पे  तेरे  लब  
सितारे  सबात  करते  है .


6)एक उलझन-

रात अभी तन्हाई की पहली दहलीज़ पे है
और मेरी जानिब अपने हाथ बढ़ाती है
सोच रही हूँ
इनको थामूँ
ज़ीना-ज़ीना सन्नाटों के तहखानों में उतरूँ
या अपने कमरों में ठहरूँ
चाँद मिरी खिड़की पे दस्तक देता है

7)जान-पहचान-
शोर मचाती मौज-ए-आब
साहिल से टकरा के जब वापस लौटी तो
पाँव के नीचे जमी हुई चमकीली सुनहरी रेत
अचानक सरक गई
कुछ-कुछ गहरे पानी में
खड़ी हुई लड़की ने सोचा
ये लम्हा कितना जाना-पहचाना लगता है

8)इस्म-

बहुत प्यार से
बाद मुद्दत के
जब से किसी शख़्स ने चाँद कहकर बुलाया है
तब से
अंधेरों की खूगर निगाहों को
हर रोशनी अच्छी लगने लगी है
9)एक मुश्किल-
टाट के परदों के पीछे से
एक तरह बारह-तेरह साला चेहरा झाँका
वो चेहरा
बहार के फूल की तरह शफ़्फ़ाफ़
लेकिन उसके हाथ में
तरकारी काटते रहने की लकीरें थीं
और उन लकीरों में
बर्तन मांझने वाली राख जमी थी
उसके हाथ
उसके चेहरे से बीस साल बड़े थे

6 सुधीजन टिपियाइन हैं:

pukhraaj टिपियाइन कि

परवीन शाकिर की एक नज़्म जो मुझे पसंद है ...

किसी दिल में जजीरे की न थी चाह
समंदर पे एक ऐसी शाम आई
दुआ अब चाहे बाम-ऐ-अर्श छू ले
तेरे दर से तो ये नाकाम आई
तू सौदागर है ऐसा हाथ जिसके
किसी की जिन्दगी बेदाम आई

डा० अमर कुमार टिपियाइन कि


"एक आंतकी का पति ओर बुद्ध की मुस्कान -उदय प्रकाश."
और इसके फ़ौरन बाद यह..
" हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था "
दोनों ही पसँद बेजोड़ और लाज़वाब !
सच कहूँ तो परवीन शाक़िर का नाम सुना ही सुना था, कभी गँभीरता से पढ़ा ही नहीं ... शायद उनकी नज़्में खुद बखुद मुझसे छिटकती रही हों .. आज एक एक लाइन गौर से पढ़ी... हमारे दरमिया ऐसा कोइ रिश्ता नहीं था !

तुम्हारे इस सँकलन प्रयास में दिलचस्पी के सबब के चलते इसके उलट ’हमारे दरमिया तो एक रिश्ता मज़बूत हो रहा है !’

खुशदीप सहगल टिपियाइन कि

पढ़ कर बेगम अख्तर की गाई ग़ज़ल याद आ गई...वो जो तुममें हममें करार था, वो क्या हुआ...

जय हिंद...

ई-गुरु राजीव टिपियाइन कि

मगर जब आज तू ने
रास्ता बदला
तो कुछ ऐसा लगा मुझ को
के जैसे तू ने मुझ से बेवफाई की.

काहे इत्ता टेंसनिया रहे हैं, सब ठीक हो जाएगा.

swapna sundari टिपियाइन कि

aaj hi is panne par ayi hu behtarin hai
lagta nhi tha k hindi bhasha ki bhi itni hanak hogi net ki duniya me.
bahot umda lga ye blog bhi aur rachnyein bhi

swapna sundari टिपियाइन कि

aur kripya btane ka kasht krein k hm kaise hindi me likh skte hai?

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