प्रसँगतः यह सूत्रपात : मेरे सह-कर्मचारी अवधेश द्विवेदी का रविवार को सुबह सुबह फोन आया कि, " सर मैं अभी नहीं आ पाऊँगा, बाबू ने मेले में दुकान लगायी है, उनकी सहायता करनी है ।" अवधेश फ़ैज़ाबाद और बस्ती की सीमा पर बसे एक गाँव से हैं । कल शाम लौट कर उन्होंनें बताया कि ’ सुकुल पाकड़ ’ का मेला था ।
सहसा ध्यान आया कि बस्ती से लगभग 20-25 किलोमीटर पर गाँव अगौना तो मैं भी 2003 में जा चुका हूँ , सहज उत्सुकतावश, प्रयोजन केवल ’ सुकुल पाकड़ ’ देखने का ही था । कुछ ख़ास नहीं, एक चबूतरे के मध्य विशाल पाकड़ का पेड़, किन्तु कुछ ख़ास भी क्योंकि इस पेड़ के नीचे ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी भाषा का इतिहास, रस मीमाँसा, रहस्यवाद के तत्व को रचने एवँ जायसी ग्रँथावली, गोस्वामी तुलसीदास को सँकलित करने की साधना की थी ।
उनके दोनों पुत्र तो अब मिर्ज़ापुर और बनारस में बस गये हैं,किन्तु गाँव वाले हर वर्ष कार्तिक के पहले दिन हिन्दी तिथिनुसार उनके जन्मदिन पर एक मेला ’ शुक्ल मेला ’ कहिये कि सुकुल मेला आयोजित करते हैं । वह सरकारी प्रश्रय या हिन्दी सँस्थान के सहायता की बाट नहीं जोहते । यह एक अनुकरणीय मिसाल है ।
और एक अकारण स्पष्टीकरण : हिन्दी दिवस और पखवाड़े के बाद इस पर एक पोस्ट का सँयोजन किया था, पर एक अनाम अनिच्छा के चलते प्रकाशित नहीं किया । कल शाम अगौना के ग्रामवासियों के गर्व और उत्साह का उदाहरण देख यह लगा कि देर से सही मुझे अपना भूलसुधार कर ही लेना चाहिये ।
अस्तु ईँशा अल्लाह : हमारा देश पखवाड़ा प्रधान देश है । अभी अभी हिन्दी पखवाड़ा गुज़र के जा चुका है । बड़ी तकरीरें हुईं होंगी, सेमिनार गोष्ठियों का बिल भी पास हो चुका होगा । गणमान्य अतिथियों ने अपने पिछले वर्ष के भाषण को थोड़ा हेर-फेर के साथ श्रोताओं के कान में उड़ेला होगा । बीकानेर प्राधिकरण के वेबसाइट पर दिये गये एक तकरीर की बानगी देखिये ।
" ..... .. निदेशक डा. के. एम. एल. पाठक ने कहा कि हिन्दी के माध्यम से ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन को सार्थक अभिव्यक्ति मिली थी। वस्तुत: हिन्दी को आगे बढ़ने में किसी दूसरी भाषा से प्रतिद्वन्द्विता नहीं है। केन्द्र की हिन्दी गृह पत्रिका मरुवाणी के 11 वें अंक को लोकार्पित कर उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारी संस्कृति है, हिन्दी को लेकर कोई बहस करने की आवश्यकता नहीं रह गई है। "
दूसरी तरफ़ प्रमोद ताम्बट साहब कनाडा की हिन्दी साप्ताहिकी Hindiabroad के स्टाफ़ लेखक फ़िरोज़ ख़ान के सँदर्भ से फरमाते हैं कि, " यह पखवाड़ा है, बीच बाज़ार में इसे घायल पड़ा देखकर मातमपुर्सी करने के लिए । जिसे मर्ज़ी हो मातमपुर्सी करे या फिर चाहे तो नजरें बचा कर निकल जाए । "
अब यह सवाल उठना लाज़िमी है, कि आख़िर जिसे हिन्दी कहा जाता है, वह क्या है ? इसका वर्तमान स्वरूप सर्वग्राह्य नहीं हो पा रहा है क्योंकि अपने देश के भाषा विशेषज्ञों का तो दुनिया में कोई सानी ही नहीं है। उन्होंने हमेशा चौकस रहते हुए इस बात का ध्यान रखा कि कैसे हिन्दी को ना समझ में आने वाली क्लिष्टतम भाषा बनाए रखा जा सके ताकि लोग अपनी राष्ट्र भाषा को जन्म-जन्मान्तर तक समझ ही ना पाएँ और इससे बिदककर अंग्रेजी की शरण में जा खडे़ हों या गाली- गलौच की सुप्रचलित भाषा का आदान-प्रदान कर अभिव्यक्ति की अपनी समस्या खुद ही सुलझा लें, और भूलकर भी हिन्दी के दरवाज़े पर आकर खड़े ना हों ।
इससे एक दूसरा सवाल निकल कर आता है कि, हिन्दी का प्रारँभिक स्वरूप जिसे जनजन ने हाथों-हाथ लिया था , वह कैसी रही होगी ? मेरी खोजबीन की सनक का एक दौर आरँभ हुआ, और..
अब तक मेरा ज्ञान यहीं तक सीमित था कि, हिन्दी की पहली कहानी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ’ उसने कहा था ’ है । अभी हाल में मेरी एक स्वनामधन्य से नोंक-झोंक हो गयी, हम एकमत नहीं हो पा रहे थे । अँत में उन्होंने अपनी खीझ यह कह कर निकाली कि, " तो, तुम लटके रहो अपने ही ज्ञान की फ़ुनगी पर... पर कम से कम इसे शिखर समझने का भ्रम भी न रखो । " अपने सीमित ज्ञान को विस्तार देते रहने की मेरी सनक ने ललकारा, ’ चल रे डाक्टर, जरा और गहरे पानी पैठ !" और.. यह प्रयास व्यर्थ न गया । एक अनोखे और नये तरह के उद्गार से रूबरु हुआ ।
एक अनोखी बात का एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदणी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले । बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो । अपने मिलने वालों में से एक कोई पढे-लिखे, पुराने धुराने, डाँग, बूढे घाग यह खटराग लाए । सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढाकर आंखें फिरा कर लगे कहने - यह बात होते दिखाई नहीं देती । हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो । बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नहीं होने का । "
मुझे लगता है कि, यह ललकार स्वीकार की गयी, और...
लखनऊ के एक अदीब ने आज लगभग खँडहर हो चुके अहाते ड्योढ़ी आग़ाबाक़र के ज़नाब सैय्यद इब्ने इँशा अल्लाह खाँ ने लगभग सन 1801 या 1803 में ’ रानी केतकी की कहानी ’ लिखी । एक सँदर्भ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का भी दिया गया, किन्तु वह मुझे ढ़ूढ़ें न मिला । बाबू श्याम सुन्दर दास ने अवश्य इसे हिन्दी यानि कि खड़ी बोली की पहली कहानी माना है, अलबत्ता इसकी लिपि उर्दू है, और इसकी प्रति लखनऊ विश्वविद्यालय की टैगोर लाइब्रेरी में बाल साहित्य में पड़ी हुई है | उन दिनों किस्सों अफ़सानों का स्वरूप सँभवतः ऎसा ही रहा करता होगा, इसलिये अपने आकार प्रकार में यह आधुनिक लँबी कहानी में रखी जा सकती है । अपनी टँकण क्षमता और पाठकों की सुविधा के दृष्टिगत इस कहानी को चार हिस्सों में बाँटने के लिये विवश हूँ
रानी केतकी की कहानी
सिर झुकाकर नाक रगडता हूं उस अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सब को बनाया और बात में वह कर दिखाया कि जिसका भेद किसी ने न पाया । आतियां जातियां जो साँ सें हैं, उसके बिन ध्यान यह सब फाँ से हैं । यह कल का पुतला जो अपने उस खिलाडी की सुध रक्खे तो खटाई में क्यों पडे और कडवा कसैला क्यों हो । उस फल की मिठाई चक्खे जो बडे से बडे अगलों ने चक्खी है । देखने को दो आँखें दीं ओर सुनने को दो कान । नाक भी सब में ऊँची कर दी मरतों को जी दान ।। मिट्टी के बसान को इतनी सकत कहाँ जो अपने कुम्हार के करतब कुछ ताड सके । सच हे, जो बनाया हुआ हो, सो अपने बनाने वाले को क्या सराहे और क्या कहें । यों जिसका जी चाहे, पडा बके । सिर से लगा पांव तक जितने रोंगटे हैं, जो सबके सब बोल उठें और सराहा करें और उतने बरसों उसी ध्यान में रहें जितनी सारी नदियों में रेत और फूल फलियां खेत में हैं, तो भी कुछ न हो सके, कराहा करें ।
इस सिर झुकाने के साथ ही दिन रात जपता हूं उस अपने दाता के भेजे हुए प्यारे को जिसके लिए यों कहा है- जो तू न होता तो मैं कुछ न बनाता; और उसका चचेरा भाई जिसका ब्याह उसके घर हुआ, उसकी सुरत मुझे लगी रहती है । मैं फूला अपने आप में नहीं समाता, और जितने उनके लडके वाले हैं, उन्हीं को मेरे जी में चाह है । और कोई कुछ हो, मुझे नहीं भाता । मुझको उम्र घराने छूट किसी चोर ठग से क्या पडी ! जीते और मरते आसरा उन्हीं सभों का और उनके घराने का रखता हूं तीसों घडी ।
डौल डाल एक अनोखी बात का एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिंदणी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जाके मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले । बाहर की बोली और गँवारी कुछ उसके बीच में न हो । अपने मिलने वालों में से एक कोई पढे-लिखे, पुराने-धुराने, डाँग, बूढे धाग यह खटराग लाए । सिर हिलाकर, मुंह थुथाकर, नाक भी चढाकर आंखें फिराकर लगे कहने - यह बात होते दिखाई नहीं देती । हिंदणीपन भी निकले और भाखापन भी न हो । बस जैसे भले लोग अच्छे आपस में बोलते चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे और छाँह किसी की न हो, यह नहीं होने का । मैंने उनकी ठंडी साँस का टहोका खाकर झुंझलाकर कहा - मैं कुछ ऐसा बढ-बोला नहीं जो राई को परबत कर दिखाऊं, जो मुझ से न हो सकता तो यह बात मुँह से क्यों निकलता ? जिस ढब से होता, इस बखेडे को टालता ।
इस कहानी का कहने वाला यहाँ आपको जताता है और जैसा कुछ उसे लोग पुकारते हैं, कह सुनाता है । दहना हाथ मुँह फेरकर आपको जताता हूँ, जो मेरे दाता ने चाहा तो यह ताव-भाव, राव-चाव और कूंद-फाँद, लपट झपट दिखाऊँ जो देखते ही आपके ध्यान का घोडा, जो बिजली से भी बहुत चंचल अल्हडपन में है, हिरन के रूप में अपनी चौकडी भूल जाए । टुक घोडे पर चढ के अपने आता हूं मैं । करतब जो कुछ है, कर दिखाता हूं मैं ॥ उस चाहने वाले ने जो चाहा तो अभी । कहता जो कुछ हूं । कर दिखाता हूं मैं ॥ अब आप कान रख के, आँखें मिला के, सन्मुख होके टुक इधर देखिए, किस ढंग से बढ चलता हूं और अपने फूल के पंखडी जैसे होंठों से किस-किस रूप के फूल उगलता हूँ । जारी है…
डॉक्टर साहब, पहले दूरदर्शन की भी हिंदी वैसी ही क्लिष्ट थी जैसी कि देश में राजपत्रित प्रायोजनों के लिए प्रयुक्त की जाती है...लेकिन पत्रकारिता के पुरोधा एस पी सिंह ने टीवी पर लोगों से संवाद कायम करने के लिए सरकारी हिंदी को नहीं उस हिंदी को अपना माध्यम बनाया जिस ज़ुबान में आम आदमी बोलता था...और यही उनके प्रोग्राम की अपार लोकप्रियता की वजह बना...ज़रूरत ऐसी गंगा-जमुनी हिंदी लिखने-बोलने की है जिसे लोग आसानी से समझ सकें...
जय हिंद...
सही हिन्दी वह है जो हम लिख-पढ़ रहे हैं।
हिंदी की पाठ्य पुस्तकों में इस कहानी का जिक्र था सर जी....अब आपके जरिये पढ़ भी लेगे
बोलचाल की भाषा और साहित्य की भाषा में अंतर होता ही है। बोलचाल की भाषा में स्थानीय और देशज़ शब्द भी आ जाते हैं जो साहित्य में उस समय प्रयोग में आते हैं जब लेखक किसी पात्र से ऐसी भाषा बुलवाना चाहे॥
कल ऐसे ही टीवी पर चैनल छानते हुए एक जगह चीन में हिंदी और भारतीय संस्कृति पर पढाने वालों से की गयी बात पर आधारित जैसा कुछ प्रोग्राम आ रहा था. २ मिनट देखा तो एक सज्जन जो वहां हिंदी पढ़ाते हैं उन्होंने बताया कि भारी सवाल पूछ कर लोग उलझन पैदा कर देते हैं जैसे किसी ने पूछ लिया... यहाँ तो दूकान में जाने पर सिर्फ चीनी ही बोलते हैं. मैं दिल्ली गया तो वहां हर दूसरा आदमी कुछ और ही बोलते नजर आता है जैसे अंग्रेजी और कुछ और भाषाएँ. आप यहाँ पढाते हैं और वहां जाने पर हर आदमी अलग तरह की हिंदी बोलता है !
कहानी पढ़ते चल रहे हैं.
जहाँ तक सरलता से समझ आ जाये और तरलता से उतर जाये...
लगे हाथ टिप्पणी भी मिल जाती, तो...
कुछ भी.., कैसा भी...बस, यूँ ही ?
ताकि इस ललित पृष्ठ पर अँकित रहे आपकी बहूमूल्य उपस्थिति !